Sunday, February 21, 2010

है बसंत आमंत्रित!!!.....


आइये स्वागत करें ऋतुराज का....


शिराओं में जैसे

खलबला कर दौड़ा हो खूँ,

स्पंदनों ने जकड ली हो,

भागते घोड़ों की टापें॥

साँसे बह रही

अनियंत्रित........

है बसंत, आमन्त्रित॥

मदन की आँखों का रंग

चढ़ गया टेसू के फूल,

बौराए हैं घबराये से

आम के पेड़,

कोयल कुहुक रही

मिष्ट-अमित............

है बसंत आमन्त्रित॥

फुनगी पे चिडयाँ

काम मे हैं लीन,

दुपहरी की वायु में

नशा है संगीन,

चलने से पहले पद हुए

विचलित.......

है बसंत आमंत्रित॥

धरते ही पग अब

उड़ने लगी धूल,

चढ़ते ही दिन के

सजने लगे फूल,

नयी- नयी कलियाँ हुई हैं

कुसमित.......

है बसंत आमंत्रित॥

रात हुई सर्द-गर्म

दिन हुए गर्म-गर्म,

न बिस्तरों को चैन

न चादरों को चैन,

सलवटें पड़ी रही चादरों में

अनवरत.......

है बसंत आमंत्रित॥

काज में न मन आज

न डर है समाज का,

सभी का यही हस्र्त्र

ये काम कामराज का,

हवा बह रही अब हो कर

असंतुलित........

है बसंत आमंत्रित॥




















Sunday, February 14, 2010

प्रेम पत्र पुस्तिका -१









प्रिय,
महज ख़त नहीं है, एक अरमान है जो पैग़ाम हो जाना चाहता है॥




सुबह उठा तो लगा, कि शबनम पत्तियों को निर्मल करके, उनके कोमार्य को महफूज़ करना चाह रही थी। मुझे वो संस्पर्श याद है जो कहीं न कहीं , इतनी ही पवित्र भावनाओं को लिए हमारे बीच पल्लवित हुए।
यादों के मंजर, ख़त मे नहीं समा सकते, पर मन करता है, कि आकाश को भी शब्दों मे बाँध कर गठरी तुम्हे सौंप दूँ।




जहाज़ पे एक मचान बना कर समन्दर कि अतुल जल राशियों को एक टक देखूं और लहरों पे छपते हुए तुम्हारे प्रितिबिम्ब को चूमने कि कोशिश करूँ.... कब ऐसी यात्रा के ख़्वाब हक़ीकत हो पाएंगे।




पता है, कल एक ग़ुलाब बेचने वाले ने पूछा था, ले जाइये न साहिब, मेमसाहिब खुश हो जायेंगी। मन ही मन उत्तर दिया, कि काश ग़ुलाब के ऊपर ग़ुलाब सजते होते ... तुम खुद वो पुष्प हो जिसकी मधुर सुगंध मेरी साँसों को सुवासित करती है।
कौन सा फूल फबेगा मेरी मोहतरमा पर।


चंद्रमा कल था नहीं, बैरी कि ज़ुरूरत भी न थी, कल खिड़कियाँ उसकी रोशनी से नहाना भी न चाहती थी। कल तो दो ऑंखें खिडकियों पर सजी रही और सिरहाने से दो हाथ निकल कर रात भर बालों में उँगलियाँ फिराते रहे ॥
अजीब ही इत्तेफाक हुआ , सुबह को उठे तो लगा, तुमने कंधे को थपथपाया था उठो चाय तैयार है....पता नहीं, वैसे तुमने कभी मुझे चाय नहीं पिलाई पर आज कि सुबह जाने क्यूँ, प्याला लिए खड़ी थी॥




अब बर्तनों को छूता हूँ kitchen मे जा कर तो शिकायतें मिलती हैं, कब तक इन कठोर हाथों के स्पर्श से उनको दुखते रहना है.... पूछते हैं बेजान, कब आएगी उम्मीदों की परी ।




पता है कल गुजरती train की खिड़की पर एक लड़की ने बिलकुल वैसा दुपट्टा डाला था, जो तुम ने पिछले ख़त मे लिखा था, तुम लायी हो बाज़ार से, नीले पे पीले बूटे ....पर वो लड़की तुम नहीं थी... किसी और शहजादे सलीम की अनारकली होगी । पर उम्मीदों का एक बड़ा सा जहाँ है,वहां तुम रोज़ आती हो, हर क्षण , हर पल होती हो..... नीले पे पीले बूटे वाला दुपट्टा डाले॥



ख़त नहीं है प्रिये, प्रुतिउत्तर मत करना, एहसास है, एक कागज़ के टुकड़े मे लपेट कर संप्रेषित कर रहा हूँ, ये अनावरण का संकेत है, एक मिलन कि गुहार और शबनमी कोमलता को चूम लेने का आग्रह है॥



ऐसे स्पर्शों की प्रतिलिपि जिनमे हिंसा की कठोरता नहीं , अहिंसा का माधुर्य है एक ऐसी छुअन जिसमे नक्काशियों की गहराई है, शिल्प का उत्कृष्ट सौंदर्य है, दिलों की चाहतों का सजीव अनुवाद है...........



कब मिलोगी???? .....

Sunday, January 31, 2010

कदम-कदम पर ख़ार

कुछ ऐसे रिश्ते, जो बहुत करीब होते है, फिर भी पूरी तरह हक़ मे नहीं...

इतना भी नहीं हक़,

कि इक बार लूँ पुकार।

ज़िन्दगी ने मिला दिया,

पर दिया नहीं अधिकार॥

नीरस,निराश, बेबस बैठा,

देखूं,पल-पल राह।

पर पुकार न पाऊं,

बैठा हूँ लाचार॥

तुम भी हो पाबंद-बंद,

खुले नहीं सब द्वार।

इतनी मज़बूरी रख कैसे,

तुम करते हमसे प्यार॥

कहते हो सर्वस्व मुझे,

पर सर्वस्व नहीं मेरा।

ताक़त मेरी मौन सदा,

नियति के इस व्यवहार॥

करूँ मुआफ,या माँगू माफ़ी,

करूँ विनय या क्रोध॥

पा कर खाली बैठा,

कैसा सौंपा ये अधिकार।

दावे-वादे,चाँद सितारे,

मन भर के मनुहार।

बात भी हो सके,मुमकिन न हो,

कैसे हम बेतार॥

महलों के सुख,

मन निराश हो,

तन खाली,आँखें भीगी,

मन हुआ शक्ति से पार॥

छुप कर मिलना,

चार मिलन बस,

जीवन पूरा खाली।

कैसे संभव होगा आगे,

जब हों,कदम-२ पर ख़ार॥

Saturday, January 16, 2010

महाकुम्भ रिश्तों का


महाकुम्भ रिश्तों का....


छूते ही लगा,

क्यूँ छुआ????

सरिता के निर्मल जल को।

गन्दा क्यूँ किया ??

सरिता सक्षम ; क्यूँ न रोके

मुझको टोके।

विस्मृत सा मैं ,

सुध-बुध खो कर,

छू-छू कर नदिया,

करता अठखेली,

फिर क्षण-क्षण सोचूं

हो न जाये मैली॥

शंका पढ़ ली, सरिता ने,

बोली,भोली-

मन से मुझमे,डुबकी,

मार सको तो मारो,

तेरे करने से मैं न,

हो पाऊँगी मैली॥

आ कर मुझसे मिल लो प्यारे,

सब दिन हो तेरे न्यारे,
मैं संकुचा सा बढ़ा, निर्मला,

पर तैयार नहीं हो पाया,

तेरी इतनी मृदुता से मन,

मेरा भर-२ आया॥

मैं उतरा जितना भीतर को,

उतना बाहर आया॥

तुम सी निर्झर सरिता,

मेरे नैनों मै उतरी है,

लगता है जितना डूबा,

मैं तुझमे, प्रिय!

तू मुझमे उतनी ही,

भीतर तक डूब गयी है...






Sunday, January 3, 2010

बिटिया


नए साल की प्रथम कविता,
उन्मान है बिटिया।
बिटिया चाहती है,
एक ऐसी कविता,
जो उसे कह दे वैसा,
जैसा वो मुझे
महसूस होती है॥
सलोनी को कैसे कहूँ,
की वो है रौनक!
हमारे आँगन की,
चिड़िया है वो,
जो चहक-२ करती है,
बातें, और फुदक-२
बताती है अपनी सौगातें॥
वो जो मेज पर रखे गुलदान को,
भी रखना चाहती है,
उतना ही सजीव,
जितनी जीवन्तता तैरती है,
उसकी अपनी आँखों मे॥
उसने देखा है एक स्वप्न,
उम्दा से उम्दा करने का,
और अब इस चाहत मे ,
वो छोड़ आई है,
माँ का आँचल॥
कर रही है तैयारी ,
एक मुहिम की,
ताकि वो पाले,
एक मुक़ाम॥
वो तकती है
हथेली पर तनी,
आढ़ी व खड़ी लकीरें,
और चाहती है,
जानना उनका अनूठा विज्ञानं॥
वो पढ़ लेना चाहती है,
अपने आना वाला कल,
आज ही से, क्यूंकि,
उसका जिज्ञासु मन ही,
तो उसे बनाता है सबल,
सफल, चंचल
और सुन्दर जैसे
मोगरा के फूल से
लिपटी हुई तितली॥
बिटिया चाहती है एक कविता........

Saturday, November 28, 2009

टूटता तारा

एक कविता...
ख्वाहिश न रहे ख्वाहिश,
हकीकत हो सके!
अँधेरी रात मे ताकता,
रहा आसमान..
कि कह दूँ,वोः
जो कह कर ,
तब्दील हो जाये
ज़िन्दगी मे॥

मगर इंतज़ार है,
कि कोई,
तारा टूटे तो सही!
कहते हैं मनौती ,
हो जाती है पूरी
देखने से ऐसा,
पता नहीं था
तब ,जब सोच रहा था-

एक रात,कि तुम
मेरी हो !
और अनायास ही
दिखी थी दो अलग-२
दिशाओं मे छूटती चिंगारियां..
सुबह-२, तुमने स्वतः ही
स्वीकार लिया था प्रेम!
मेरा प्रेम!
मैंने कही थी,
बीती रात की जिज्ञासा,
और चिंगारियों का चित्र,
तब तुमने ही कहा था,
पूरी हो गई न ख्वाहिश,
जो माँगी थी,
तब ! जब एक तारा टूट रहा था।

अब मुझे तुम्हारी बात पर
यकीन बहुत आता है॥

Tuesday, November 10, 2009

खुदा.देवता.वाहेगुरु.और GOD

एक कविता अचानक ही फूटी, पता नही कहाँ से, पर सच के करीब लगी, गौर करियेगा,

एक पीर अपनी दरगाह से
बाहर निकला तो पाया
सामने दरगाह के,
मन्दिर है एक बड़ा॥
चल कर पहुँचा वहाँ,
पर नही मिला कोई देवता,
सुनाई दी आती हुई पास से,
कुछ आवाजें , अट्टहास,
और ठहाके॥
आगे बढा तो मन्दिर की,
दीवार से ही लगा था ,
एक गिरजा,,
जहाँ पर क्राइस्ट के साथ
बैठा हुआ था देवता॥
पीर को देखते ही उसने कहा,
आइएगा भाई सा ,
कैसे निकलना हुआ!
पीर कहने लगा,
आज गुरूद्वारे पर भीड़ थी,
सोचा वो मित्र तो आने से रहा,
इस तरफ़ को रुख किया,
तो मन्दिर बड़ा सा दिख पडा॥
क्राइस्ट ने इस पर कहा,
अच्छा बहुत तब ये हुआ,
इस बहाने मिल लिया,
बरना ये आदम जात ने,
बांटा हमे है इस कदर,
की इनकी जिदों के वास्ते,
तू है खुदा,ये देवता,
मैं GOd हूँ ,और वो,
वाहे गुरु हो रह गया॥

Friday, October 30, 2009

एक ख़त सनम का





TELE कम्युनिकेशन के युग मे ख़त इत्तेफाक हो गए हैं, अब तो मोबाइल, बैंक खाते के ब्यौरे और कई ज़ुरूरी कागज़ भी इ-मेल के जरिये ही आया करते हैं.. पहले कुछ और ही मज़ा था , ऐसा कहते हैं, मगर मुझे लगता है, की अभी भी पोस्ट ओफ्फिसस और कुरिएर का अहम् स्थान है, ख़त लिखने का अलग रुतबा है, उसका इंतज़ार करने का अपना रंग है, और बल्ब की रौशनी मे लिफाफा देख कर फाड़ने का अभी भी मन मे ख्याल आता है, ख्याल आता है की अन्दर प्रेषित भावनाए क्षति न हो जाए॥ ख़त खोलने का अपना सलीका होता है, उसे पढ़ने से पहले उलट पलट के देखने का अपना नजरिया होता है... क्या होता है जब आता है बहुप्रीतिक्षित एक ख़त अपनी प्रेयषी का ???

एक कागज़,
कागज़ नही रहा,
हो गया है वोः,
एक हवाई जहाज़॥
शीश महल और,
अंतरिक्ष का एक,
महत्त्वपरक हिस्सा,
तुमने लिख दिये हैं उसमे,
अपनी ज़िन्दगी के,
कुछ पल,
अब मैं बिताना चाहता हूँ,
कुछ समय,
उसे देख कर।

बनाना चाहता हूँ ,
अपनी जिंदगी के कुछ क्षण,
बेशकीमती॥
घर मे खाली पडी है,
एक दीवार,
बहुप्रीतिक्षित॥
सजा देना चाहता हूँ- उसे,
एक सुंदर भावनाओं से
भरे चित्र से ,
सिरहाने रखना चाहता हूँ
एक बाइबल जो,
चिर निद्रा मे लीन होने तक,
मुझे थपथपाता रहे,
सहलाता रहे मेरे बाल ,
उम्र भर॥








Monday, October 12, 2009

मुझे आधार तो मिल सकता था!


एक मित्र जो ज़ुरूरत को समझे बगैर, या ज़ुरूरत की ज़ुरूरत को भुला कर चला गया, मैंने उस के व्यव्हार को अपने शब्द दिए, पता नही कितने सटीक हैं-




तुम चले गए,

बिना बुने खाट,

रोका था तुम्हें, कि

रुक कर बुनवाना

चारपाई॥

मगर तुम डरते थे,

शायद,खिंचते हुए,

सूत से,

तुम्हे तनाव मे,

व्यग्रता लगती है॥

और इसी लिए शायद,

तुमने भुला दिया

मुझे ही, कि

बुनना है चारपाई॥

ज़ुरूरी था मेरी

पीठ के लिए,

मेरे आधार के लिए॥

शायद !!!!!

तुम इस लिए भी

डर -सहम रहे थे

की खींचते मे,

टूट न जाए पुरानी

पड़ चुकी रस्सियाँ,

मगर तुम तोड़ते तो......

बहुत कुछ

बिगड़ थोड़े जाता,

गाँठ ही पड़ जाती

मगर कम से कम-२

इन सब तनाव, खिचाव

और गाँठों के रहते,

बुनी तो जाती

चारपाई॥

मुझे आधार तो

मिल सकता था॥


Thursday, September 10, 2009

का बरखा जब कृषि सुखानी


कल से हो रही बेसुध बारिश से मन मे उपजी एक विचार चेतना,

एक बेसुध बारिश,
खबर से परे,कि,
अब तक रुका नहीं,
कोई किसान,
उसका एहसान लेने..

कईयों ने फेक दिया बीज,
माँ धरती कि कोख मे,
सोचे बिना,
कि तुम आओगे या नहीं,
करने उन्हें फलित,
करने सम्भोग...

तुम तो हो गए हो,
आवारा, मेघ,
कर्त्तव्य विमूढ़ शायद,
जब चाहो,
रखते हो मौन,
चाहे जब गरजना,
चालू कर देते हो..

कितनो ने तो,
छोड़ ही रखा है,
खाली का खाली,खेत.
धूल उड़ गई,
उड़ गई रेत,
क्यूँ आ गये मुह दिखाने,
अब, क्या हुआ अंतर्द्वंद्व.

ऐसा ही हो गया है,
हमारा समाज,
बेटा तब आता है,
वापस घर रात को,
जब माँ, टूट कर ,
सो जाती है,

और संताने,
तब आती हैं राह पर
जब पिता को,
आ चुका होता है,
हृदयाघात..

स्त्री पर तब ,
आता है प्रेम,
जब पढ़ चुके होते हैं,
तलाक..

तब पता चलती है,
सही राह,
जब हो चुका होता है,
बड़ा वर्ग , गुमराह..





Sunday, September 6, 2009

हमने तो बस प्रीति निभाई..



एक कविता, जो निष्प्रह प्रेम के लिए है, धरती और आकाश के प्रेम की कविता है, ऐ क्षितिज की कविता है...




फूलों पर पड़ गई ओ़स कि बूंदे,
जैसे तुम भीग गई हो मुझसे।
मुस्का कर लहराती है बगिया,
जैसे कुछ सीख रही है तुझसे॥


तुम हो जाती हो, अम्बर,
छा जाती हो मुझ पर।
मैं धरती हो जाता हूँ,
ओढ़ बैठता तेरा अम्बर॥


कब क्षितिज सच होता है,
कब धरती नभ से मिलती।
पर देखो तो नज़र गडा कर,
दिखती तो है मिलती॥


वैसा ही कुछ प्रेम हमारा,
मिलन नहीं हो पाया,
पर देखो तो कैसे बदरा,
धरती के घर आया,
कि पूरा आँगन छाया...

जब बरसे बदराए नैना,
धरती उमस भरे थी।
रोती सी दिखती न थी,
पर रोती बहुत रही थी॥

कौन करिश्माई है सक्षम,
ऐसा प्रेम जुटाया।
दूर पथिक दो,राह अलग हो,
पर मन कैसे मिलवाया॥

होगा कोई मकसद उसका,
जिसने प्रीति रचाई,
उसकी मर्ज़ी को माथे रख,
हमने तो बस प्रीति निभाई......
:)

Sunday, August 9, 2009

वीर की राखी

सावन आया और मन मे जगा नेह, बहिन का भाई पर अतुल नेह॥

इस बार कुछ अवसर एसा बना की लग ही नही रहा था की दीदी के पास जाना हो पायेगा, लेकिन फ़ोन पर बात हुई और मुह से निकल गया दीदी आप घर (shahpur) पहुँच जाओ, तीनो भाईओं को राखी बांधनी हो तो ! बस उनको तो बात जम गई, उन्होंने किसी भाई को नही कहा की कोई लेने आ जाओ, उन्हें सबकी व्यस्तता का एहसास था, उन्होंने दोनों बच्चों को कार मे बिठाया और आ गई झाँसी से शाहपुर (Sagar) । हमने भी सारी मजबुरिओं को खारिज किया और रात ३ बजे बैठे लोह्पथ गामिनी मे और उषाकाल मे घर ... लखनऊ से कंचन दी ने भी भेजी थी बहुत सुंदर राखी तो सोचा कलाई पे तो बहिन ही बांधेगी॥

कल रात कंचन दी से बात हुई तो ज़िक्र हुआ वीर भइया का, दी से दिल का मर्म सुनकर मुझे कुछ भाव जगे , मैने फ़ोन रखते ही diary मे उतार लिए, और वापस लगाया दी को फ़ोन॥ वादा किया की आज की पोस्ट कलाई के धागे के नाम,

पढिये एक बहिन का राखी संदेश उसके फौजी वीर भैया के नाम, यह कविता गई भी जा सकती है...

गा कर देखिये ..आपको सुंदर लगेगा इसका राग।

वीर भइया को भेजी है राखी,

धक२ अब ये कलेजा करेगा।

बाँध लेना तुम ख़ुद ही कलाई,

नेह मेरा तुम्हे जो मिलेगा॥

भाल रखना तो अंगुली ज़रा पल,

टीका उभरा हुआ सा लगेगा।

वीर हो कर सिपहिया गए हो,

पूरा भारत ही अपना लगेगा।

मैं अकेली नही तेरी बहिना,

तुझे हर बहिना का टीका सजेगा।

तुम हो कर वहां ,हो यहाँ भी,

करते बहिनों की इज्ज़त की रक्षा।

इससे और बड़ा क्या मेरे भैया,

राखी बंधाई मे मुझको मिलेगा॥

Sunday, August 2, 2009

दोस्तों,
मत सोचिये की मैं ज़रा आता हूँ और बहुत गायब रहता हूँ,,, वक्त शायद कुछ और ही चाहता है॥
मैं खुश हूँ आज बहुत आपसे दिल की बात बांटने मे, की मुझे और बेहतर नौकरी मिल गई ॥ निजी कम्पनिओं मे चलन को हो गया है,की जॉब पर रहते हुए आपकी तरक्की बाधित हो जाती है, चाहे आप कितने ही मुकम्मल तरीके से काम मे मशगुल हों... मेरे साथ भी लगभग वही हुआ,,, पर किस्मत और आप सब की दुआ से मुझे नया मुकाम मिला, मैं अब एक नई कंपनी के लिए काम करूँगा ॥ एक छोटी सी कविता मेरी बात कह रही है, गौर करिएगा ,

एक कमरा अँधियारा था
एक दीप रखने से पहले,

कई असफलताएँ हैं,
लोग कहते हैं -मेरे जीवन मे,,
मगर मुझे ज्ञात है,
एक सफलता का दीप,
सारी असफलताओं का ,
तिमिर पी लेगा सदा के लिए॥

Sunday, June 28, 2009

कोई पूछता नही है, पर मैं कह देता हूँ एक कविता मुझ पर !!!



लिखना है, तो लिख दो,

ऑफिस की बॉक्स फाइलों पर,

सफ़ेद दीमक की कविता,

चाहो तो लिख दो,

हांफते मजदूरों पर कविता,

अगर लिखना है मुझ पर,,

तो लिख दो आंसुओं पर कविता

कविता लिख दो, घडे में,

पड़े चुल्लू भर पानी पर,

खाली बैंक खातों पर,

उधेड़बुन पर कविता,

उलझनों पर कविता,

अगर लिखना है मुझ पर,

तो लिख दो आंसुओं पर कविता॥

क़र्ज़ को फ़र्ज़ सम ,

उसे चुकाने पर कविता,

अपनों की बातो मे,

उलझ जाने पर कविता,

कविता मुझ पर लिखना हो,

तो लिख दो.....

खाली कलमदावातों पर कविता

झूठी दी गई,

सौगातों पर कविता,

रूठी किस्मत पर कविता,

रौनी सूरत पर कविता,

अफसरशाही की,

हांजी,हांजी पर कविता,

चुन लो चाहे जो,

लिखना होगी हर,

कलम सिपाही को,

मुझ पर कविता

घुट जाने पर कविता,

मिट जाने पर कविता,

फिर भी सर उठाने पर कविता,,

खीझ कर तंत्र पर गरियाने पर,

आक्रोश मे खलबला जाने पर,

कविता, mutthiya bheen


Monday, June 22, 2009

उसने माँगा है मुझे,अगले जनम के लिए,


दोस्तों, देखिये न फीर कोई ज़िन्दगी मे आया, और कहने लगा इस बार तो हम मजबूर हैं, अगले जनम तेरे सनम,,,

हम से पूछिये क्या होता है दिल का, हाल॥ फिल हाल तो सुनिए इस बात के निकलने के बाद की बात का ज़िक्र!!

उसने माँगा है मुझे,

अगले जनम के लिए,

क्या सौगात दूँ,इस बात पर,

अपने सनम के लिए॥

मैं भी बुन रहा हूँ किस्से ,

जो बनेंगे जिंदगी के हिस्से,

तुम और मैं जब हम हो जाएँगे,

धड़कन -२ मैं बंध जायेंगे॥

पर अब हम किसी शहर मे नही मिलेंगे,

कोई छोटा गाँव देख ,हम पैदा होंगे,

एक झरना, एक पर्वत होगा,

गाय, बकरियां भेड़े होंगी।

कश्मीरी लड़की सी तुम,

सुंदर पोषा पहन कर आना,

मुझ ग्वाले को एक पोटली,

रोटी सत्तू बंध के लाना ॥

बैठ पर्वतों पर जीवन को गायेंगे हम,

अपनी गोद मे सर तेरा रख,

जुल्फों को सहलायेंगे हम॥

तुम नज़रों से छेड़ोगी ,और,

पलक झुका लोगी पल भर मे॥

फिर पलकों को ऊपर कर,

फलक उठा लोगी पल भर मे॥

मैं लिखूंगा, कवितायें,

तेरे रूप की तेरे रंग की।

गा-गा कर तुम्हे सुनाऊंगा,

मधु राग और नव-तरंग भी॥

मधुशाला से तेरे होंठ ये,

हो जायेंगे मेरे अपने,

सच हो जायेंगे सब सपने॥

धीर धरोगी, और मुझे भी,

धीरवान कर दोगी तुम,

मुझे मिलोगी जिस दिन प्रिय तुम,

कंचन जीवन कर दोगी तुम॥

Sunday, June 14, 2009

एक कविता तुम पर॥

एक रोमांटिक भाव

कविता, फुनगी पर,

चहकती एक चिडिया पर,

एक कविता, घिर आए बादरों पर,

कविता एक, रिमझिम-२

सावन पर॥

और, एक कविता तुम पर॥

लंबे बालों को जूडे मे,बांधे

एक लड़की पर,

मचलती, चहकती,

एक बातूनी लड़की पर,

और, एक कविता तुम पर॥

आषाढ़ मे आशा लगाए,

मेघों से,दरकती हुई ज़मीन पर॥

धरती मे धंसे प्यासे कुँए पर,

चंद्रमा पर कविता,

सितारों पर कविता,

और एक कविता तुम पर॥

गुलाबी-सफ़ेद पोशाक पर,

गाल मे पड़े गड्ढे पर,

अपने वर्ण पर, कद पर,

काया के सौष्ठव पर,

यही है प्रिये!!

एक कविता तुम पर॥

Sunday, June 7, 2009

विचार केंद्रित कवितायें


दो विचार केंद्रित कवितायें,

१) चक्रब्यूह मे फंसा एक और अभिमन्यु!!

चक्रब्यूह कई!

कई अभिमन्यु,

कई-२ कौरव//

मैं भी हूँ......

एन कई चक्रब्युहों मे से

किसी एक मे फंसा,

अर्धशिक्षित,

अभिमन्यु॥

घुस तो गया हूँ,

पर तोड़ रहा है,चक्रब्यूह,

मुझे.....!!

वैसे ही जैसे की छल के कौरवों ने,

सम्पन्न कर दिया था,

एक वीर अभिमन्यु!!

पाप भी सक्षम है,

जीतने में,

दुनिया की किताब कहती है॥

कहता है चित्र-

विचित्र बड़ा है,

न्याय और अन्याय

के बीच तालमेल॥

कौरवों का तंत्र

खुश है,आज भी,

तैयार है बलि, उसके लिए।

चक्रब्यूह मे फंसा एक और अभिमन्यु!!

) माना तुम हो बुद्धिजीवी,

शलभ की विपदा को,

लिप्सा तो न कहो!

माना तुम हो बुद्धिजीवी,

पर तुम ,

शलभ तो नही!

होते जो तुम तो,

कहते न प्रेम की

अनुभूति को,

लिप्सा की गंदगी!!

वरन होते ख़ुद रत!

रोते लिपट-२ ,

खोते तुम प्राणों को,

ज्योति मे सिमट-२,

अंधेरे मे घुट कर जीने से,

लगता ये अंदाज़ भला।

उजारे के आलिंगन मे,

मौत का रूप उजला-२!

शलभ की विपदा को,

लिप्सा तो न कहो!!

Sunday, May 24, 2009

कुछ क्षणिकाएँ

आइए ज़िन्दगी के कुछ इत्तेफकों की बात करें,
उन्मान है , sorry!
मैंने उससे पूछा!
उसने मुझसे कुछ कहा??
इससे पहले वो कुछ कहता,
मैंने उससे कहा,
मुझे लगा जैसे आपने कुछ कहा॥
इस पर वो कुछ कहता।
मैंने फिर उससे कहा,
कभी-२ हो जाता है॥
उसने कुछ कहने के बजाय,
मुस्कुरा दिया,
ऐसा भी होता है॥
कभी-२ sorry!

चाँद को लेते हैं, कभी मामा तो कभी सनम, कभी इसका कभी उसका, कैसे ??? लीजिए बताता हूँ,
आज चौदहवी का,
कल पूनम का ,
कितना बेवफा है,
किसी एक का हो न सका॥
आफ़ताब !
वो दाग है,
ये दिलनशीं,
या पड़ गईं हैं झुर्रियां!
उम्रदराज हो कर भी,
क्यूँ बदनाम होना चाहते हो॥


अब एक रोमांटिक क्षणिका !!
तुमने अन्दर आने का पूछा !
मैंने दी अनुमति!!
मगर फिर भी,
उतना अन्दर,
न आ सकी,
जितने अन्दर तक,
आने के लिए ,
मैंने दे दी थी अनुमति !!



Sunday, May 10, 2009

मेरी माँ !!!


मातृत्व दिवस की शुभ युति पर आये माँ की स्तुति करें। उनका गुण अनुवाद करें॥

आज सुबह जब दैनिक भास्कर अख़बार उठाया तो पाया की , बहुत कुछ लिखा गया है, और बहुत ही संवेदनात्मक लिखा गया है, मन हुआ हम भी माँ के बारे मे लिखें, कुछ कहें माँ के लिए... अपना कहें उससे पहले अख़बार मे जो पढ़ा और मन बना उसकी बात करते हैं,

मुनव्वर राणा का ashaar है,

मुनव्वर माँ के आगे, yun कभी खुल कर मत रोना,

jahan buniyad हो, इतनी nami achchhi नही होती॥

आँखें नम हो गई,

nida fazali sahab भी क्या कहते हैं ,गौर kariye-

besan की saundhi roti पर khatti chatni जैसी माँ,

याद आती है chauka baasan,chimta fukni जैसी माँ॥

बीवी,बेटी,बहन,padosan,thodi-२ si सब मे,

दिन bhar एक rassi के ऊपर chalti natni जैसी माँ॥

इसके अलावा भी , Chndrakant devtaale,विष्णु naagar,Manglesh Dabraal,राजकुमार kesvani,leeladhar mandloi जैसे siddh hast लोगो ने माँ की स्तुति मे कोई kami नही rakhi,

इसके अलावा भी जितना जो भी chhapa, kafi sparshi lagga॥

इतनी सुंदर baton को पढने के बाद, मेरा मन koutuk करने लगा की वो ऐ सब किस से कहे, तो मैं आ गया, इस peepal के नीचे॥

jahan हम सब जमा है,

माँ दूर है, पर pal-२, विचार मे रहती है,

kehti है, क्या khaya , सुबह से ??

मैं, कहता मन ही मन, माँ, bhukha hun,

अभी नही kia नाश्ता,

वो हो jati है shunya, aankho मे bhar दो aansu,

pallu से paunchh लेती है, khaara pan,

पता है उसे, कितना namkeen पसंद है bete को॥

drudhtaa से puchhti है, kyun, laaparvahi॥

वो puchhti फ़ोन पर , कैसा चल rahaa है सब,

जान कर भी, की सब ruka हुआ है, उसके बिना॥

ehsaas dilati है, की, rukna नही है zindagi, किसी भी तरह॥

abhav से ऊपर भी होगी baten एक दिन।

kahti है माँ, और फिर paunchh लेती है pallu से aansu।

pankha nhai उसके, पर मन मे parvaaz बहुत हैं,

वो आ कर sahla jati है, tab-२ जब-२ nibatti है, chauke से,

और jhaank कर देख jati है, tab, जब मे soya हुआ होता hun,

कई bar देखा है सुबह,कोई dhank जाता है chadar ,

रात की badhi हुई shardi-garmi के mutabik॥

उसकी बहुत ichchha है, मेरा घर हो बड़ा sa इस शहर मे,

shadi हो, मेरे bachche हों, वो सब मेरे लिए जुटा देना chahti,

और हो जाना chahti बहुत खुश॥

जब-२ मैं बढ़ता hun एक भी paydaan,

वो paunchh कर दो bund aansu pallu से,

lapet लेती है मुझे, aanchal मे,

मेरी माँ को पता है, की मुझे कितना namkeen पसंद है॥

मैंने माँ के लिए likhi कुछ और कवितायें ब्लॉग मे post kee हैं, अगर आप पढ़ना चाहते हैं तो zurur नीचे likhi link को click करें।

http://29rakeshjain.blogspot.com/2008/05/blog-post_11.html

http://29rakeshjain.blogspot.com/2008/05/blog-post_5529.html

http://29rakeshjain.blogspot.com/2008/05/blog-post_10.html

takniki khamiyon से कुछ कमी है , post के proper visualization मे, kshama करे, पर मैं इस post मे देर नही करना चाह रहा krupya, मेरी mano दशा को समझें.

Sunday, May 3, 2009

कागज़ की गाय

पढ़ने वालों के लिए एक विचार केंद्रित कविता, जो आधुनिकजीवन शैली के बारे में आपसे एक सच बोलेगी॥
शीर्षक है, कागज़ की गाय-
गौर करियेगा-
कागज़ पृष्ठ से, मढे,
घृत के डिब्बे,
को ला कर,
अपने बर्तन मे ,
जब उडेला और,
फेंका वह रिक्त पात्र
बच्चे ने अकस्मात् ही पूछा,
माँ! यह देखो गाय,
माँ! गाय को यहाँ क्यूँ बनाया॥
गाय तो दूध देती है,
तब क्या, ! कागज़ की गाय,
घी देती है॥
माँ ने सुना , हँसा !!
और बस बताया,
की नहीं बेटा,
दूध से ही घी बनता है॥
पुनः जिज्ञासा !!! कैसे ??
यह तो माँ को भी नही पता !!:)
क्यूंकि उसे तो गौरव है,
आधुनिक माँ होने का, जिसे
उपलब्ध होता रहा है, सदा,
कागज़ की गाय का घी।
और प्लास्टिक की गाय का दूध,
इस बड़े शहर में॥