पढ़ने वालों के लिए एक विचार केंद्रित कविता, जो आधुनिकजीवन शैली के बारे में आपसे एक सच बोलेगी॥
शीर्षक है, कागज़ की गाय-
गौर करियेगा-
कागज़ पृष्ठ से, मढे,
घृत के डिब्बे,
को ला कर,
अपने बर्तन मे ,
जब उडेला और,
फेंका वह रिक्त पात्र
बच्चे ने अकस्मात् ही पूछा,
माँ! यह देखो गाय,
माँ! गाय को यहाँ क्यूँ बनाया॥
गाय तो दूध देती है,
तब क्या, ! कागज़ की गाय,
घी देती है॥
माँ ने सुना , हँसा !!
और बस बताया,
की नहीं बेटा,
दूध से ही घी बनता है॥
पुनः जिज्ञासा !!! कैसे ??
यह तो माँ को भी नही पता !!:)
क्यूंकि उसे तो गौरव है,
आधुनिक माँ होने का, जिसे
उपलब्ध होता रहा है, सदा,
कागज़ की गाय का घी।
और प्लास्टिक की गाय का दूध,
इस बड़े शहर में॥
Sunday, May 3, 2009
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3 comments:
behtreen........aaj ke halat darshati hai.
dhanybad!
:)
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