Saturday, October 22, 2011

प्रिय कविता के लिए!!!

इस बात पर न रख सवाल के अब तक कहाँ रहे...
बस पूछ लो कि अब हाल कैसा है....!?

प्रिय कविता के लिए!


अतीत में, कविता अक्सर ही,
करती थी चुहल,
रंगरेलिओं की पहल।
आकर, छू लेती थी सअधिकार,
और चूम कर अंकित कर देती थी,
उसके दहकते होंठ, मेरे चेहरे पे कई बार।
मेरे पलंग, मेरे सिरहाने में,
मेरी Diary के लिहाफ में अक्सर ही,
दुबक और निकल आती थी;
और रगड़ खाती थी मुझसे, मेरे स्नानागार मे,
छुपकर तौलिए के बीच।
मेरी ज़िन्दगी का सुख-दुःख अक्सर कहती
नज़र आती थी महफिलों के बीच॥
बहुत चाहती थी और शायद अब भी चाहती है,
मगर जब से हुई है मेरी शादी,
वो रखने लगी है अंतर ,
झाँक कर रोशनदान से,
अक्सर ही लौट जाती है - "उदासमना"
घबराती है आलिंगन से,
और हिचकिचाहट में भर जाती है,
देख कर किसी और को उसके और मेरे बीच॥
आज मेरी पत्नी गई थी कहीं बाहर,
और मौका पाते ही आगई है वो (कविता),
एकांत को देने सहारा, और कहने आप बीती,
इस बीच मेरी पत्नी आ चुकी है वापस,
और उसने रंगे हाथ पकड़ ली हैं ये कन्फुसियां॥
वो (पत्नी) मुस्कराकर चली गई है अन्दर,
हमे देकर एक मौन स्वीकृति,
बिताने के लिए कुछ समय साथ-२॥



Sunday, May 29, 2011

वो जीते जी रहे नहीं, वो मरे हुए से हैं...

मित्रो! एक लम्बे अन्तराल के उपरांत एक कविता प्रेषित कर रहा हूँ, जो एक एसे व्यक्ति की अंतर्व्यथा है, जिसे ज़माना इस्तेमाल करना चाहता है, पर उसके इस इस्तेमाल से ज़माना खुद को ही छलता है....


यह कविता सिगरेटके शौकीनों के लिए चेतावनी भी है,,,






लोग खाक छानते रहे,
मैं धुआं हो गया।
वो मलते रहे उँगलियों मे,
मैं हवा हो गया॥
वो जलाते रहे,
उड़ाते रहे,
बना के गुल रास्ते में ,
मुझको झडाते रहे॥
बदन को पीते रहे,
शेष को,जूते से दबाते रहे।
वो नादान,
बेजान समझते थे मुझे,
मुझे जलाते तो रहे,
खुद को सुलगाते भी रहे।
मैं बुझ कर भी बुझा नहीं,
वो पीकर मुझे बुझे से हैं॥
मैं खाक रह गया हूँ,
या हो गया हूँ धुआं
वो जीते जी रहे नहीं,
वो मरे हुए से हैं॥

Tuesday, February 1, 2011

तुम पर लिख दूं सुन्दर कविता....




प्रेयषी जो अर्धांगनी होने को है....


तुम पर लिख दूँ सुन्दर कविता,

शब्दों का श्रंगार करूँ॥

आ कर बैठो, मेरे सम्मुख,

तुम से नैना चार

शर्म हया की चादर छोड़ो,

तो थोडा खुल कर प्यार करूँ॥

हाथों मे हाथों को डालूँ,

परिणय को स्वीकार करूँ॥

झुकी पलक और नीची गर्दन,

क्या तेरा मनुहार करूँ॥

तुम पर लिख दूँ सुन्दर कविता,

शब्दों का श्रृंगार करूँ॥

अपना कह कर ह्रदय बसाया,

क्या इसका बिस्तार करूँ?

नम पलकों मे मुझे बिठाया,

क्या इसका आभार करूँ,

तुम पर लिख दूं सुन्दर कविता....