Sunday, May 11, 2008

अलविदा,कह दिया माँ से॥

माँ के लिए लिखे काव्य संकलन पर नज़र दौडाई तो लगा, kyun न ये एक वास्तविक सी कविता आपसे बांटु -
पंच्छियो ने सीखे थे,
चहकने के लिए शब्द,
माँ से॥
बड़े प्यार की बातें सीखी,
उन्होंने उड़ना सीखा ,
माँ से॥
शिकारी बिल्ली से बचना सीखा,
savdhani से दाना चुगना सीखा,
माँ से॥
उन्होंने घोंसला बुनना सीखा,
दाना जोड़ना सीखा,
माँ से॥
और अब , सीख कर यह सब,
उन्होंने बनाया,
अलग घोंसला,
अलग जीवन,
कहा अलविदा,
जो न सिखाया था माँ ने,कभी॥
कह दिया माँ से॥

10 comments:

Dr.Parveen Chopra said...

इस संसार की कड़वी सच्चाई भी आपने कितनी ही सहजता से पेश कर दी। बि्लकुल सही मां ने कभी अलविदा कहना तो ना सिखाया।

प्रभाकर पाण्डेय said...

बहुत ही यथार्थ रचना । सदा सत्य। चंद पंक्तियों में जीवन की सच्चाई कह गए आप। बहुत ही उत्तम विचार।

राजीव रंजन प्रसाद said...

कठोर किंतु सत्य..

***राजीव रंजन प्रसाद

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया. पढ़कर अच्छा लगा.
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आप हिन्दी में लिखते हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं, इस निवेदन के साथ कि नये लोगों को जोड़ें, पुरानों को प्रोत्साहित करें-यही हिन्दी चिट्ठाजगत की सच्ची सेवा है.

एक नया हिन्दी चिट्ठा किसी नये व्यक्ति से भी शुरु करवायें और हिन्दी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें.

यह एक अभियान है. इस संदेश को अधिकाधिक प्रसार देकर आप भी इस अभियान का हिस्सा बनें.

शुभकामनाऐं.

समीर लाल
(उड़न तश्तरी)

कंचन सिंह चौहान said...

kya baat hai rakeksh.... yathartha hi likha tumne...badi hi samvedanshil kavita

mamta said...

सुंदर और सच्ची रचना ।

राकेश जैन said...

Dr, Praveen jee, Prabhakar ji,rajiv g,priya sameer ji, Mamta g, aur pujya kanchan di, ap sab ka vaicharik sambal is tarah se milta rahe bas yahi apeksha hai..

pallavi trivedi said...

बहुत प्यारी और यथार्थ को उजागर करती रचना.

Manish said...

सही कहा अलविदा कहना तो कोई माँ नहीं सिखाती पर नियति यही है कि बच्चे अपने आप सीख लेते हैं। अच्छी रचना..

vishal said...

मार्मिक, भावप्रधान और शिक्षाप्रद।। माँ कभी अलविदा कहना नहीं सिखाती।