
पेश है सावन की अगन मे जलता हुआ एक बिरह गीत.
जाने कौन प्रीति की मारी,
गाती होगी सावन गीत,
एक बिरह की गाथा में ही,
जाएगा यह सावन बीत॥
रे ! पछुआ के पवन चुभीले,
जा तो उसकी ओर,
बदरी भर ले , शीतल नीर,
छींटे डालो उसके ठौर ..
कहना एक बिरह का मारा,
रोया इतना रात,
ख़ुद से ही कह पाया पर,
वो अपने दिल की बात।
पर घुमड़े से मेघ देख कर,
मन में आई बात,
क्यूँ न, भेजे एक बदरी भर,
आंसू तेरे पास॥
तू अब गा-गा कर भीगेगी,
मेरे अश्रु गीत,
या आने का जतन करेगी !
मेरी अनजानी मीत।
माना तुमसे मिले नहीं,
पर हम को है अनुमान,
सावन तेरे नयन हो गए,
तू है राह देख हैरान॥
चित्त नही लगता दुनिया में,
मन रहता एकांत,
कौन नीड़ का भटका पंछी
ढूंढ़ रहा है ठान॥
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6 comments:
वाह!
वास्तव में सावन की अगन में जलता हुआ एक व्याकुल कर देता हुआ विरह गीत.
जाने कौन प्रीति की मारी,
गाती होगी सावन गीत,
एक बिरह की गाथा में ही,
जाएगा यह सावन बीत ॥
bahut sundar badhai.
चित्त नही लगता दुनिया में,
मन रहता एकांत,
कौन नीड़ का भटका पंछी
ढूंढ़ रहा है ठान॥
बहुत खूब। बधाई स्वीकारें।
बेहद खूबसूरत...
बहुत उम्दा...
वाह!
Shukriya aap sabhi ka, yun hee hausla dete rahen, bahut sukun lagta hai.
sundar bhav purna Rachana... likhte raho
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