Sunday, June 1, 2008

मेरा जन्म दिन -29th may (diary के पन्नों से)

इसे मेरी diary का एक अंश समझिए, यूं तो मैं अक्सर आप सभी को अपनी कविता ही सुनाता हूँ, पर कुछ मौके ऐसे आ जाते हैं जो बिना लाग लपेट के अपनों से बाँट लेने का मन करता है॥ आप मैं से सिर्फ़ कंचन दी हैं जो इस प्रविष्टि के लिखे जाने से पहले से जानती हैं कि २९ may को मेरा जन्म दिन आता है॥इस बार भी आया॥ मेरी ज़िंदगी के उपन्यास के २८ अंक पूरे पढ़ लिए गए॥ कुछ मे ३६५ पृष्ट रहे और किसी-२ अंक मे ३६६ भी थे ,उस अंक मे ज़िंदगी ने कुछ ज़्यादा कहने की कोशिश की होगी शायद॥
उन्तीस्वे अंक कि भूमिका मैं आपको सुना रहा हूँ॥ फ़ोन काल्स का सिलसिला २८ -२९ कि दर्म्यानी रात से ही शुरू हो गया जिसमे मेरी पूज्य कंचन दी का कॉल भी था। आपमें से कितने लोग उनसे जुड़े हैं नही पता पर उनके आशीर्वाद और दुआओं मे अलग ही एहसास है। वो जिन भावनाओं से कुछ कहती हैं,,वो तो बस महसूस ही किया जा सकता है॥
उनका अतुल स्नेह मेरी ज़िंदगी के 2८वे अंक के पन्नों मे लिखा जाना शुरू हुआ, और अब अन्तिम कड़ी तक यूं ही बना रहेगा.आप ये न समझिए कि यह कोई उपन्यासकार लिख रहा है॥ मैं तो इस उपन्यास का एक पात्र हूँ जो उपन्यासकार को मेज़ पर न देख अपने मन की कुछ कहने को पन्नों से बाहर निकल आया। मुझे यह भी नही पता कि कोई सुन भी रहा है या नही, क्यूंकि मैं कोई सदा हुआ कथाकार नही जो लिखता ही यूं है कि सब पढ़ने को लालायित रहते हैं॥
२९ कि सुबह को माँ को फ़ोन लगाता ,इससे पहले उनका फ़ोन आ गया, और इससे पहले मैं उनसे प्रणाम कहता उन्होंने खुश रहो कह दिया ॥इतनी तत्परता माँ के ह्रदय मे होती है बच्चों को दुआ देने की जिसकी कोई कल्पना नही है॥वो तो मुझे अप्रत्यक्ष हो कर भी सहलाती रहती है॥ वो बहुत अनुमति है, वो जब मेरे पास आती है इस बड़े शहर मे तो मुझसे पूछती है, इतने बड़े शहर मे तुम्हे कहाँ जाना है तुम भूलते नही हो? ???मैं हंस कर रह जाता हूँ, माँ को क्या कहूँ॥ कुछ भी नही होता इस प्रश्न का उत्तर मेरे पास॥

सुबह पहले मंदिर फिर Office पहुँचा सभी साथियों ने पुरी ऊर्जा के साथ दुआ दी। मगर एक दुआ ऐसी थी कि मुझे रोमांचित कर गई॥मेरे office मे बहुत सारे Helpers होते हैं , उनमे से एक रमेश भी है। रमेश ने जैसे ही सुना कि आज मेरा जन्म दिन है, वो आस पास पड़े बेकार कागजों से एक सुंदर फूल तरास कर मेरे पास बड़ा कम्प्ता हुआ आया, sir मेरी तरफ़ से ये तोहफा ले लीजिए॥उसकी ऑंखें भरी हुई थी, और मेरे रोम-२ मे सिहरन हो गई। मैंने उसे बांहों मे भर लिया॥इस जन्मदिन का सबसे खूबसूरत यही तोहफा था॥

अब शाम कि बात करते हैं जब office से लौटा तो कविता दरवाजे पर ही मिल गई, और फिर कहने लगी सबके लिए कुछ न कुछ पहले तो मैंने उसे रोका यह कह कर -
कि मुद्दतों से लिखी नही,मैंने कोई शायरी ॥
तुम आती नही हो कभी,बन कर कलम, स्याही या diary॥
लेकिन वो न रुकी और कहती गई --बस कहती गई॥
पहली कविता बनी सभी चाहने वालों के लिए-
दुआओं के इतने सिलसिले,
इतनी क्रम बद्धता,
इतना स्नेह,
इतना स्मरण,
मेरे पास है, अनंत शक्ति!
यह सकारात्मक लोग हैं, चारों तरफ़,
तो लगता है,बहुत कुछ है ज़िंदगी मे मेरी॥
कविता ने हाथ पकड़ा और मुझे छोड़ आई उनके गलियारे-हमने कहा-
तुम क्यों चहक- २ कर ,
उछल- कूद मे लगी हो ,सुबह से ही॥
क्यों कह रही हो ,सबसे
कुछ अच्छा खाने का मन हो रहा है आज॥
कहती हो !क्यों न घर मे ही बनाया जाए Cake।
लोग प्रश्नाचिह्नित हो कर झांक रहे हैं,
तुम्हारी आँखों मे,और देख रहे
हैं आज एक अजनबी रोमांच,
जो उनकी दुनिया के सलीके से हट कर है॥
मगर तुम मना रही हो,
मेरी-तुम्हारी खुशियाँ ,अपने ही सलीके से।
उस अपने सलीके से हटकर रहने वाले लोगों के बीच॥

और जब उसको खुश देखता हूँ कल्पनाओं मे भी तो फिर मैं क्या हो जाता हूँ ये भी सुनिए न!!
खुशबू दिख रही है,
चित्र महसूस हो रहे हैं,
एहसास पढे जाने लगे हैं॥
साँसे शब्द उगलने लगी है,
लग रहा है जो कभी नही लगा ॥
हो रहा है जो कभी नही हुआ,
इसके आगे लिखूं तो कलम कहने लगी,
हो गया वह जो होना चाहता है,
हो गई वो बात जो कहनी थी,
अब विश्रांति लेलो॥
अब विश्रांति लेलो ॥
बस इतना लिखा ही था कि अजय, मेरा बहुत करीबी मित्र आ गया , तभी मेरे सभी पड़ोसी भी जमा हो गए और हम सब बहुत देर तक कविताओं के दौर मे बैठे रहे, और फिर मेरी भांजी शानू, बहिन चंचल और अनुज सौरभ भी आ गए ॥ मीनू मेरी बहिन जो इंदौर मे ही Job मे है office कि तम-झाम नही निबटा पाई और नही पहुँच पाई ... हम लोग एक restaurant मे dinner लेकर एक दुसरे से विदा हो गए..मैं सोने से पहले सोचता रहा ..मैं कितना सौभाग्यावंत हूँ जो मेरे चारों तरफ़ इतनी सकारात्मक ऊर्जा का प्रबाह है॥ आँख कब लाग गई ,,ये तो उपन्यासकार ही बताएगा, दरवाज़ा खुलने कि आवाज़ हो रही है॥ मैं वापस २९ वे अंक के प्रष्ठ क्रमांक 03 मे वापस जा रहा हूँ....

6 comments:

अनूप शुक्ल said...

जन्मदिन की अनेकानेक मंगलकामनायें।

sanjay patel said...

जन्म दिन पर दुआएँ यहीं कि ख़ूब अच्छा पढ़ते रहें ...गुनते रहे ...और लिखते रहें

Udan Tashtari said...

देर से ही सही-जन्म दिन की अनेकों शुभकामनाऐं एवं बधाई.

बाल किशन said...

जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई.
आपके लिखने की शैली बहुत ही रुचिकर है.
जारी रखें.

राकेश जैन said...

aap sabhi ke prati kritagyata se labrej, apka- Rakesh

महामंत्री (तस्लीम ) said...

भई, देर से ही सही, पर जन्म दिन की बधाई।
आप ऐसे ही जिंदगी के पथ पर आगे बढते रहें और प्यारी प्यारी कविताएं हम लोगों को पढवाते रहें।