Friday, May 16, 2008

क्षणिकाएँ

१) योग्यता के आभाव में,,

मैं कैसे दूँ उन्हें !

आमंत्रण।

कहते हैं,

शेरनी का दूध रखने को,

सोने का पात्र चाहिए॥

मेरी लकड़ी कि कठोती ,

पात्रता के आभाव मे ,

मौन हो गई है,

आहिस्ता से॥

२) मैं समझा नही

उसे, या

वो समझे नही

मुझे॥

नहीं पता,

पता है तो सिर्फ़ यह,

कि कहीं न कहीं

समझ का फर्क है॥

३) दिल.

कुछ एक ऐसा हैं,

जिसे टूटने पर

रखा नही जाता ॥

कुछ एक ऐसा है

जिसे टूटने पर

फेंका नही जाता॥

कितना फर्क है,

जिस्म के भीतर ,

और जिस्म के बाहर ,
दुनिया में॥

7 comments:

Udan Tashtari said...

न. २ पसंद आई. बधाई.

राजीव रंजन प्रसाद said...

तीनों ही क्षणिकायें बेहतरीन हैं, पहली क्षणिका में प्रयुक्त बिम्ब प्रभावित करते हैं..

***राजीव रंजन प्रासाद

pallavi trivedi said...

मेरी लकड़ी कि कठोती ,

पात्रता के आभाव मे ,

मौन हो गई है,

आहिस्ता से॥

bahut khoob...bahut uttam.

neeraj badhwar said...

सच तीनों ही उम्दा है।

Gaurtalab said...

bahut badhiya

राकेश जैन said...

hauslaafzai ka bahut shukria..

कंचन सिंह चौहान said...

कितना फर्क है,जिस्म के भीतर ,
और जिस्म के बाहर ,
दुनिया में॥
sach kaha..!