मित्रो ! अफ़सोस होता है किमैं इस सतरंगी दुनिया से लगातार जुडा नही रह पाता, शायद आपका निरंतर स्नेह मेरे भाग्य कि किसी कमी के चलते अंतरालों मे विभक्त हो जाता है...
मैं अनंत यात्रा पे निकला एक चेतन पुंज इस बार मानव योनि मे आया, मैने अनंत दुखों को पाया और अनन्त सुखों का भी भोग किया होगा पर मुझे कुछ याद नहीं है, ऐसा मेरा मानना सिर्फ इस लिए है क्योंकि धार्मिक ग्रंथों मे मेरा विश्वास द्रढ़ है। इस बार मैं आत्म कल्याण के मार्ग पर कदम रख अपनी आत्मा कि उन्नति के लिए कुछ अनूठे प्रयास करना चाहता हूँ॥ सामर्थ्य सीमित है किन्तु प्रयास कर के अगली तैयारी थोड़ी और मज़बूत करना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि मेरी यह तैयारी मुझे सुख-दुख, जीवन-मरण और आवागमन के फेरों से मुक्त कर दे॥ मैं सब जीवों के प्रति करुणा भाव कि प्रवलता के लिए प्रार्थी हूँ और मेरे द्वारा हुए या हो राहे मनो आघातों के लिए उनसे क्षमा चाहता हूँ॥ कृपया मुझे क्षमा कर मेरी आत्मोंनती मे सहायक बनें॥
0 comments:
Post a Comment