Thursday, September 1, 2016
Story # Saturday in a corporate with 5 Days working Culture
Tuesday, August 30, 2016
सदैव, शाश्वत और मौन
Monday, May 2, 2016
क्षमा बावा के लिए-
मैं भी खोया हुआ सा रहता हूँ।।
मैं अब हारा हुआ सा रहता हूँ।।
मैं अब स्याह अंधेरों में रहता हूँ ।।
मैं तेरे दिए सबक सारे पढ़ता हूँ ।।
मैं बिखरा हुआ गुहार करता हूँ।।
क्षमा बावा के लिए
आर्द्र, नयन से शोख लिया।
तब पथराए नयन कुँज ने
द्रवित ही होना छोड़ दिया।।
अब चिड़ियाँ तेरे कमरे की
झंझावातों की हलचल ने
ठोस ठिकाना तोड़ दिया।।
अब बेहद सन्नाटा पसरा
तेरे जाने भर से बावा
बच्चों ने आना छोड़ दिया।।
पौंछ गया एक काला बादल
टिमटिम करते तारों ने भी
नभ पर छाना छोड़ दिया।।
पूरा पहाड़ कविताओं में
पर ऐसे सुंदर लेखक ने
कलम उठाना छोड़ दिया।
आर्द्र, नयन से शोख लिया।
तब पथराए नयन कुँज ने
द्रवित ही होना छोड़ दिया।।
Wednesday, February 10, 2016
यह समाज आखिर चाहता क्या है ???
Friday, January 8, 2016
-राकेश जैन
( भारत वन मुंबई में संध्या भ्रमण के समय उपजा एक व्यंग्य )
Friday, November 27, 2015
रागिनी गाई नहीं;
स्वागत में बस एक,
मन ही बिछोना था;
मन को पढ़ लिया,
और तुम आ गई।
क्रांति है क्षण-२ में ;
साहस के अंतस में ,
स्वप्न एक सलोना था;
हिम्मत को दाद दी ,
और तुम आ गई।
वो आसमान बन गई ;
वृष्टि ने सूरज संग,
एक बीज बोया था;
बुलबुल ने पेड़ चुना;
चहकने को आ गई।
कहाँ कदम ठिठक गए;
लड़खड़ाते क़दमों ने फिर,
ताल को सजोया था ;
ताल में तल्लीन हो,
थिरकने को आ गई।
लक्ष्य में एकाग्रता;
आशीष की प्रवलता,
बावा की बुलबुल* वो;
चंचल सी दृष्टि लिए,
एनाक्षी* आ गई।
* बुलबुल- चहकने के लिए प्रिसिद्ध चिड़िया,मुनिश्री को चिड़िया से बहुत स्नेह है।
Wednesday, September 16, 2015
Friday, July 24, 2015
प्रेयसी, परिणिता हुई,
हो गई धडकन साथ।
जाऊँ अब में कहीं,
होती है वो साथ।।.
चेहरा उसका सामने,
नहीं नज़र से दूर।
स्वप्न सुंदरी वही है,
वो खुली पलक का नूर।।
मुझको उसका चाहना,
जैसे चातक की चाह।
ह्रदय बना है नाविका,
बनी है वो मल्लाह।।
साँस साँस का साथ ये,
जब तक सांसों में साँस।
उसकी इतनी आस है,
मेरा है विश्वास।।
Saturday, April 5, 2014
हे महासिंधु ! तेरी विनय में
प. पू. मुनि श्री क्षमा सागर जी के लिए
(मुनिश्री की वाणी और प्रवचन इतने प्रभावशाली हैं कि वो जन मानस में नवचेतना का प्रसार करते हैं, विदित हो कि मुनिश्री के स्वास्थगत कारणो से उनके कंठ से वर्त्तमान में स्वर नहीं निकलता)
कंठ में उत्साह था तो
बोल कर सब को बताया।
थक गया जो कंठ तो,
फिर नेत्रों ने बीड़ा उठाया।।
वो समंदर है अतुल बल
भावना का अथक संबल।
तब बोल कर वो बांटता था
नज़रों से है वो अब लुटाता।।
शब्द शायद सोचते हों
फिर उन्हें चूमे अधर।
अंदर घुमड़ कर बादलों से
जाते होंगे अब वो सिमट।।
वो नेह का दीपक सलोना
उनको भी ढांढस बाँधता है।
उम्मीद से ख़ुद को संजो कर
जग को वो हिम्मत बाँटता है। .
मैं जब मिला और पूछा उनसे
क्या है मुझे अब तेरी आज्ञा।
"कुछ भी नहीं " में सर हिलाकर
आशीष को बस कर उठाता।।
हे महासिंधु ! तेरी विनय में
गीत लिख पाता नहीं हूँ।
तुम मौन रहकर बोलते हो
मैं बोलकर कह पाता नहीं हूँ।।
Saturday, February 22, 2014
गाओ सप्तक, धड्को धकधक
ज़िन्दगी चलती रहेगी
सब कुछ चले मन के मुताबिक
सोचने से कुछ न चलेगा।
रास्ते पथरीले हों या
रास्ते सुगम सहज हों
हौसले मे चलना हो तो
मंजिलों पर जा मिलेगा।
कौन था जो न चला हो
और पहुँचा हो शिखर तक
केवल वो जो मान बैठे
मैं पहले ही पहुंचा हुआ था।
बात बेमानी भी नहीं है
सोच लो तो ये भी सच है
तू जहाँ पहुंचा हुआ है
कोई उस तक दौड़ता है।
हर पथिक का है नजरिया
हर पथिक की अपनी दुविधा
सत्य को जो खोज लेगा
वही इससे पार चुकता।
सहज न तो रास्ते हैं
न सहज चलना निरंतर
ठहर कर मन को मनाना
और भी है कार्य दुर्गम
कुछ भी नहीं है नियत वैसा
सोचा जैसा, देखा जैसा
होना अचंभित, चकित होना
नहीं हल है ज़िन्दगी का
बस चला चल,
लहर जैसे बिना सोचे
चलती आती
और खोती खुद को खुद में
अंतस मना में मौज खाती
डूब जाती, तैर जाती
और किनारों को बताती
रे कठिनतर, कठोर पत्थर
मुझ निर्मला से करो प्रणय
घुलना सीखो , मिटना सीखो
तैरना और, डूबना भी
आई चलकर इसलिए हूँ
चलना निरंतर है मयस्सर
वरना मैं उसकी गोद में थी
जो है बृहत , बहुतों की मंजिल
मेरे साहिल, छोड़ जिद (कठोरपन),
करदे समर्पण , मौन क्यूँ हो.
गाओ सप्तक, धड्को धकधक
थाप दो , बोलो छप -छप
मुस्कुराओ , तैर जाओ,
करदे समर्पण, करदे समर्पण
-राकेश
Sunday, December 30, 2012
।।सादर श्रद्धांजली।।
जीवन का
अब मृत्यु ही
अंतिम हाला है।
ईश्वर ने
जो चुना अंत में
वह इंसाफ
ज़ुरूरी था
तार-2 हो,
इस दुनिया में
वरना रोज़
उधडती वो।
जो हुआ
घिनौना
एक बार तो
हर माँ-बहिना है
घायल,
हर रोज़
फब्तियां सुनती
तो फिर
कैसे सहती
वो मुश्किल।
चिर शांति के
पन्ने श्वेत
उस बिटिया
को रखो समेट,
अपने पन्ने
रखना बंद
ताकि वो न
हो शर्मिंद।
Tuesday, April 24, 2012
अखबार
लगता है डर...
एक रोज़ गलती से,
पड़ गया पानी,
शब्द स्याही कि जगह,
लहू बन के बह निकले..
कुछ और नहीं होता,
मौत और मौत,
बस मौत छपी होती है,
झरोखे सी कोई जगह हो
तो कोइ अबला,
इज्ज़त के लिए रोती है..
कोई छोड़ गया होता है
रोता हुआ बच्चा,
किसी माँ का तो आता ही नहीं
जो पढने गया था सुबहा.
कोई मुक्कम्मल सी बजह नहीं
कि अब अख़बार पढ़ें घर में
अब तो दिल पत्थर का हो तो
अख़बार लगे घर में..
कि ख़बर पढ़ता हूँ, तभी
बेटी को जाना होता है स्कूल,
सहम कर भेज तो देता हूँ
फिर पलटता हूँ वही ख़बरें,,
कि दुपट्टा ओढ़ के गई थी,
मगर झीना था बहुत..
फाड़ के वसन, चीर ली इज्ज़त,
अज्ञात थे कोई पता नहीं पाया,
पुलिस ने पड़ताल करी,
हाथ नहीं कुछ आया.
अब अखबार मंगाने मे
लगता है डर...
एक रोज़ गलती से,
पड़ गया पानी,
शब्द स्याही कि जगह,
लहू बन के बह निकले..
Sunday, March 18, 2012
बड़ा बेसब्र है वो मेरी इनायतें पाने को,
वक़्त पीछे पड़ा है , उसकी ऐ कशिश आजमाने को।
वो रोता बहुत है मेरे पास आने को,
वक़्त उसे रुलाता बहुत है आजमाने को॥
मैं कहता हूँ हौसला बढाने को,
वो लड़ता है मुझसे ऐ दिलासा दिलाने को।
वो नहीं है तो सेहरा तो मेरी ज़िन्दगी भी है,
वो रो कर लगा है उसे दरिया बनाने को॥
घट रहा कुछ इस क़द्र,न देखा, न सोचा था कभी,
वक़्त के पैतरें हैं सब सबक सिखाने को।
मेरा फरमान है ज़रा चुप कर, सम्हल जा साथी,
सिर्फ आंसू तो नाकाफी हैं, यूँ दरिया बनाने को॥
आरज़ू रख,अमल में ला, कि सब खैरियत ही है,
देखना है कितना और है वक़्त बदल जाने को।
हम बने एक दूजे के लिए,है वक़्त का ही करम,
दूर रख कर भी वो, देगा कोई नूर हमे सजाने को।
हम नीड़ बसायेंगे जो साथ मिला है हम-दम,
दूरियां मिट जाएँगी बखुद, सपना ऐ सजाने को.......
Saturday, October 22, 2011
प्रिय कविता के लिए!!!
बस पूछ लो कि अब हाल कैसा है....!?
प्रिय कविता के लिए!
अतीत में, कविता अक्सर ही,
करती थी चुहल,
रंगरेलिओं की पहल।
आकर, छू लेती थी सअधिकार,
और चूम कर अंकित कर देती थी,
उसके दहकते होंठ, मेरे चेहरे पे कई बार।
मेरे पलंग, मेरे सिरहाने में,
मेरी Diary के लिहाफ में अक्सर ही,
दुबक और निकल आती थी;
और रगड़ खाती थी मुझसे, मेरे स्नानागार मे,
छुपकर तौलिए के बीच।
मेरी ज़िन्दगी का सुख-दुःख अक्सर कहती
नज़र आती थी महफिलों के बीच॥
बहुत चाहती थी और शायद अब भी चाहती है,
मगर जब से हुई है मेरी शादी,
वो रखने लगी है अंतर ,
झाँक कर रोशनदान से,
अक्सर ही लौट जाती है - "उदासमना"
घबराती है आलिंगन से,
और हिचकिचाहट में भर जाती है,
देख कर किसी और को उसके और मेरे बीच॥
आज मेरी पत्नी गई थी कहीं बाहर,
और मौका पाते ही आगई है वो (कविता),
एकांत को देने सहारा, और कहने आप बीती,
इस बीच मेरी पत्नी आ चुकी है वापस,
और उसने रंगे हाथ पकड़ ली हैं ये कन्फुसियां॥
वो (पत्नी) मुस्कराकर चली गई है अन्दर,
हमे देकर एक मौन स्वीकृति,
बिताने के लिए कुछ समय साथ-२॥
Sunday, May 29, 2011
वो जीते जी रहे नहीं, वो मरे हुए से हैं...
यह कविता सिगरेटके शौकीनों के लिए चेतावनी भी है,,,

मैं धुआं हो गया।
वो मलते रहे उँगलियों मे,
मैं हवा हो गया॥
वो जलाते रहे,
उड़ाते रहे,
बना के गुल रास्ते में ,
मुझको झडाते रहे॥
बदन को पीते रहे,
शेष को,जूते से दबाते रहे।
वो नादान,
बेजान समझते थे मुझे,
मुझे जलाते तो रहे,
खुद को सुलगाते भी रहे।
मैं बुझ कर भी बुझा नहीं,
वो पीकर मुझे बुझे से हैं॥
मैं खाक रह गया हूँ,
या हो गया हूँ धुआं
वो जीते जी रहे नहीं,
वो मरे हुए से हैं॥
Tuesday, February 1, 2011
तुम पर लिख दूं सुन्दर कविता....
प्रेयषी जो अर्धांगनी होने को है....
तुम पर लिख दूँ सुन्दर कविता,
शब्दों का श्रंगार करूँ॥
आ कर बैठो, मेरे सम्मुख,
तुम से नैना चार
शर्म हया की चादर छोड़ो,
तो थोडा खुल कर प्यार करूँ॥
हाथों मे हाथों को डालूँ,
परिणय को स्वीकार करूँ॥
झुकी पलक और नीची गर्दन,
क्या तेरा मनुहार करूँ॥
तुम पर लिख दूँ सुन्दर कविता,
शब्दों का श्रृंगार करूँ॥
अपना कह कर ह्रदय बसाया,
क्या इसका बिस्तार करूँ?
नम पलकों मे मुझे बिठाया,
क्या इसका आभार करूँ,
तुम पर लिख दूं सुन्दर कविता....
Saturday, August 21, 2010
सूरज लौट गया संध्या आने पर..

Sunday, August 8, 2010
आदमी अब आदमी सा नहीं लगता

दिल घबरा सा रहा है, पर भी लिखा जा रहा है--------
पथरा गए हैं पेड़,
पत्तियां हो गयीं है चिमनियाँ।
रहा नहीं सुरक्षित ठहरना,पास,
दिन में भी रात में भी
सदा उगलती है CO2 गैस
नहीं बरसता h2o अब,
H2So4 की होती है,
मिली जुली वर्षा॥
granite के बगीचों में,
ठंडक नहीं होती है
होता है ज्वर सा कठिन ताप॥
बच्चों की शक्ल में,
पैदा होने लगे हैं रोबोट॥
आदमी हो गया है,
अर्ध मशीनी पुर्जा,
कठिन है ढूंढ़ पाना ठौर॥
दोपहर उग आती है,
सुबह के सूरज के साथ,
सबेरा अब सबेरा सा नहीं होता॥
घरों पर उगने लगा है,
टी.वी का छत्ता,
दादी ने बताया था,
खपरैल घरों में बारिश में,
उगा करता था, इसी शक्ल में कुकुर मुत्ता॥
छत्ता किरने खींच -२ कर दिखाता है,
बहु रंगी चित्र,
जिसमे बस अपना चेहरा नहीं होता॥
नज़रों और सितारों के बीच,
छाई रहती है, धुंए की परत,
सफ़ेद अब हो गया है off-white ।
अब आँगन में उगता है,
नीम का बोनसाई,
जिसकी छाओं में बमुश्किल,
सो पता है पालतू कुत्ता,
रोटी गोल नहीं रही,
हो गयी है चप्पल्नुमा,
खाने लगा है आदमी जाने क्या-२॥
कब्र में भी, अब,
महफूज़ नहीं हैं लाशें॥
आंसू बहाने के लिए,
आँखों में डालने पड़ते हैं स्प्रे॥
और हंसने के लिए अब चाहिए,
laughing गैस,
इतना बनावटी हो गया है, सब,
कि आदमी अब आदमी सा नहीं लगता॥
Saturday, July 24, 2010
प्यारी कंचन दी!
प्यारी कंचन दी!
एक दुआ कि साहित्य के आसमान पर चंदा की तरह चमको॥
जन्म दिवस की शुभ कामना ,
सिंदूरी माहताब देता,
दूधिया आफ़ताब देता,
उसकी हर आरज़ू का,
मैं यूँ जवाब देता..
वो दूर, है पर,
ग़र मेरे करीब होता,
गुलशन का हर ऐक,
उसको हसीं ग़ुलाब देता..
वो है हसीं शख्स ख़ुद,
मांगेगा न मुझसे,ऐ सब,
सोचता हूँ मैं तब,
उसे कैसे नवाज़ देता..
जो आसमान सा बृहत,
जो सूरज सा उज्जवल,
उसे मैं क्या सवाब देता..
जिसने रखे सजो कर,
ग़म भी जैसे मोती,
उस इंसानियत के बुत को,
मैं क्या लिहाफ देता..
सब सोच कर फिर सोचा,
दूंगा नहीं मैं उसको,
कुछ मांगता हूँ उससे,
क्या वो हसीन मुझ को,
एक वादा शुमार देगा,
हँसता रहेगा हर दम,
ये बात मान लेगा..
कितनी रहेगी मुश्किल,
तूफ़ान भी घिरेंगे,
वो हो कर के सबसे आगे,
क़िश्ती निकाल लेगा॥
सिंदूरी माहताब देता,
दूधिया आफ़ताब देता,
उसकी हर आरज़ू का,
मैं यूँ जवाब देता॥

