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Saturday, August 21, 2010

सूरज लौट गया संध्या आने पर..


एक कविता मेरे एकांत जीवन से ....>>>>>>>
सूरज लौट गया,
संध्या आने पर।
अपने घर जाता...
कितनी सांझें बीती,
पर हमको कौन बुलाता
दिन-रात बना क्रम,
चंदा-सूरज,
अपनी-अपनी राह पकड़ते...
हम गतिहीन आसमाँ होकर,
एक जगह पर डेरा करते॥
दूर मातु और पिता योग से,
एकांत निविर मे ढूंढे साता....
मन विचलित पर,
कौंध-२ कर,
प्रश्न एक ही करता जाता,
सूरज लौट गया,
संध्या आने पर,
अपने घर जाता॥
कितनी सांझें बीती पर,
हमको कौन बुलाता॥
रजनीकाल में जुग-जुग तारे,
पाँव पसारे नभ में सोते,
सुबह-सुबह चल देते निजपथ,
पर हमे कौन????
निज पथ बतलाता॥
सूरज लौट गया,
संध्या आने पर,
अपने घर जाता.....
कितनी सांझें बीती पर,
हमको कौन बुलाता...??

Sunday, April 18, 2010

भय, भगवन और मैं कठपुतली



अकेलेपन में उपजी, एक सम्मिश्रित भावों की रचना, जिसमे भय भी है, भगवन भी है...
भय अज्ञात भयंकर,
मन को घेरे रहता,
ये धर्म सहारा दे कर,
मुझको थामे रहता॥

रखता एक पग, आगे,
दो पग पीछे जाता,
कैसा ये विश्वास हुआ,
एक पल में डिग जाता॥

जब न था कुछ,सुख,
तब ही सांचा सुख था,
अब सुख झूठा पाले,
मन भ्रम में है भरमाता॥

तान-वितान, सुर खोये हैं,
लय से टूटा नाता,
एक साधता, दूजा डिगता,
मन धर न पाए साता॥

कौन खीचता डोरी मेरी,
कठपुतली सा नाच नचाता,
कभी शिखर पर,कभी ज़मीं पर,
उठा-पटक कर खेल बनाता॥

इतना नीरव देकर मुझको,
जाने क्या है सिखलाता,
महफ़िल में भी रहूँ अकेला,
मन में भय इतना भर जाता॥

टूट गई होती अब तक तो,
साँसे भी इस पीड़ा में,
पर वो नट ही जाने क्यूँ,
और डोर बढ़ाता जाता.....
























Sunday, April 11, 2010

मेरे आशियाने मे

आज दोपहर गुडगाँव पहुंचा, अपने घर आया, और एकांत मे उपजी एक कविता, गौर कीजिए,

खुश खबरी है,मेरे घर में,

छिपकली ने दिए हैं- अंडे॥

उनमे से कुछ एक खुल भी गए हैं,

कुछ अभी खुल रहे हैं॥

मुझे अब पता चला कि कोई है,

जो खुद को महफूज़ समझता है,

मेरे इर्द-गिर्द ॥

मैंने देखी नहीं कभी कोई,

दूसरी छिपकली अपने घर मे,

मैं तो इसे ही समझता था अब तक नर॥

पर यह तो मादा निकली,

जिसने सम्मान दिया मुझे,

जन कर अपने सुत-सुता मेरे पास॥

मैं अकेला नहीं रहा अब,

घर आने के लिए,

मन मे एक ख्याल रहने लगा है॥

क्या कर रहे होंगे लाडले,

बाकी के अंडे भी खुल चुकें शायद,

पहुंचू जब शाम तक घर पर॥

वो शरमाई सी दुबकी होगी,

कोने मे ,और दरवाजे खुलते ही,

इठलाकर छिप जाएगी,

दीवार पर टंगी तस्वीर के पीछे॥

मैं झांक कर देखता रहूँगा ,

उसे एक टक॥

और वो मुझे भी वैसे ही॥

अब अकेलापन नहीं लगता,

जल्दी रहती है,

ऑफिस से घर आने की,

और खुशी बहुत होती है,

कि कोई है! जो महफूज़ है,

मेरे आशियाने में॥