मैं भी खोया हुआ सा रहता हूँ।।
मैं अब हारा हुआ सा रहता हूँ।।
मैं अब स्याह अंधेरों में रहता हूँ ।।
मैं तेरे दिए सबक सारे पढ़ता हूँ ।।
मैं बिखरा हुआ गुहार करता हूँ।।

प्रेयषी जो अर्धांगनी होने को है....
तुम पर लिख दूँ सुन्दर कविता,
शब्दों का श्रंगार करूँ॥
आ कर बैठो, मेरे सम्मुख,
तुम से नैना चार
शर्म हया की चादर छोड़ो,
तो थोडा खुल कर प्यार करूँ॥
हाथों मे हाथों को डालूँ,
परिणय को स्वीकार करूँ॥
झुकी पलक और नीची गर्दन,
क्या तेरा मनुहार करूँ॥
तुम पर लिख दूँ सुन्दर कविता,
शब्दों का श्रृंगार करूँ॥
अपना कह कर ह्रदय बसाया,
क्या इसका बिस्तार करूँ?
नम पलकों मे मुझे बिठाया,
क्या इसका आभार करूँ,
तुम पर लिख दूं सुन्दर कविता....


दिल घबरा सा रहा है, पर भी लिखा जा रहा है--------
पथरा गए हैं पेड़,
पत्तियां हो गयीं है चिमनियाँ।
रहा नहीं सुरक्षित ठहरना,पास,
दिन में भी रात में भी
सदा उगलती है CO2 गैस
नहीं बरसता h2o अब,
H2So4 की होती है,
मिली जुली वर्षा॥
granite के बगीचों में,
ठंडक नहीं होती है
होता है ज्वर सा कठिन ताप॥
बच्चों की शक्ल में,
पैदा होने लगे हैं रोबोट॥
आदमी हो गया है,
अर्ध मशीनी पुर्जा,
कठिन है ढूंढ़ पाना ठौर॥
दोपहर उग आती है,
सुबह के सूरज के साथ,
सबेरा अब सबेरा सा नहीं होता॥
घरों पर उगने लगा है,
टी.वी का छत्ता,
दादी ने बताया था,
खपरैल घरों में बारिश में,
उगा करता था, इसी शक्ल में कुकुर मुत्ता॥
छत्ता किरने खींच -२ कर दिखाता है,
बहु रंगी चित्र,
जिसमे बस अपना चेहरा नहीं होता॥
नज़रों और सितारों के बीच,
छाई रहती है, धुंए की परत,
सफ़ेद अब हो गया है off-white ।
अब आँगन में उगता है,
नीम का बोनसाई,
जिसकी छाओं में बमुश्किल,
सो पता है पालतू कुत्ता,
रोटी गोल नहीं रही,
हो गयी है चप्पल्नुमा,
खाने लगा है आदमी जाने क्या-२॥
कब्र में भी, अब,
महफूज़ नहीं हैं लाशें॥
आंसू बहाने के लिए,
आँखों में डालने पड़ते हैं स्प्रे॥
और हंसने के लिए अब चाहिए,
laughing गैस,
इतना बनावटी हो गया है, सब,
कि आदमी अब आदमी सा नहीं लगता॥
प्यारी कंचन दी!
एक दुआ कि साहित्य के आसमान पर चंदा की तरह चमको॥
जन्म दिवस की शुभ कामना ,
सिंदूरी माहताब देता,
दूधिया आफ़ताब देता,
उसकी हर आरज़ू का,
मैं यूँ जवाब देता..
वो दूर, है पर,
ग़र मेरे करीब होता,
गुलशन का हर ऐक,
उसको हसीं ग़ुलाब देता..
वो है हसीं शख्स ख़ुद,
मांगेगा न मुझसे,ऐ सब,
सोचता हूँ मैं तब,
उसे कैसे नवाज़ देता..
जो आसमान सा बृहत,
जो सूरज सा उज्जवल,
उसे मैं क्या सवाब देता..
जिसने रखे सजो कर,
ग़म भी जैसे मोती,
उस इंसानियत के बुत को,
मैं क्या लिहाफ देता..
सब सोच कर फिर सोचा,
दूंगा नहीं मैं उसको,
कुछ मांगता हूँ उससे,
क्या वो हसीन मुझ को,
एक वादा शुमार देगा,
हँसता रहेगा हर दम,
ये बात मान लेगा..
कितनी रहेगी मुश्किल,
तूफ़ान भी घिरेंगे,
वो हो कर के सबसे आगे,
क़िश्ती निकाल लेगा॥
सिंदूरी माहताब देता,
दूधिया आफ़ताब देता,
उसकी हर आरज़ू का,
मैं यूँ जवाब देता॥
अपनी diary के पन्नों को पलट रहा हूँ, सोचा ये दो कविताएँ आपसे भी बाँटू ....
१) तितलियाँ.....
दरवाजा खुलने की आहट हो,
कि लगता है, तुम आई हो॥
तुम तो जानती हो कि,
मैं भूल जाता हूँ॥
भूल जाता हूँ कि,
तितलियों के आने में,
न आहट जुरुरी है,
न दरवाजा खुलना॥
बस जुरुरी है तो इतना,
कि अन्दर कोई महक,
उनका स्वागत कर रही हो॥
वो आ जाती हैं,दरख्तों से,
झोंको से,वातायनों से,
और नहीं तो वो पैदा हो जाती है,
उस ख़ुश्बू मे खुद -ब-खुद,
अभी-अभी,जैसा हुआ॥
२) मैं!
मैं एक ऐसी क़िताब हूँ,
जिसकी आवरण पृष्ट के अलावा,
सारी पृविष्टियाँ सबल हैं॥
और वो एक ऐसी क़िताब हैं,,
जिनकी आवरण पृष्ट के अलावा,
सारी पृविष्टियाँ,शून्य॥
मगर वो सफल हैं,
क्यूंकि इस दौर में,
भीतर झाँकना कौन चाहता है॥
दो क्षणिकाएं...
१)तुम रोया मत करो
आंसुओं को,
शर्मिंदगी महसूस होती है,
झूठा रोना रोने में॥
२) गलियाँ मौन इसलिए नहीं,
कि बहुत देर से कोई गुज़रा नहीं॥
बल्कि यूँ, कि वो गुजरने वालों से,
अब बात नहीं करती॥