Monday, May 2, 2016

क्षमा बावा के लिए-

तेरे खोने से बस फर्क इतना है
मैं भी खोया हुआ सा रहता हूँ।।
रास्ते तेरे बिना सब दुर्गम हैं
मैं अब हारा हुआ सा रहता हूँ।।
तेरा जाना जैसे चिराग़ बुझ जाना
मैं अब स्याह अंधेरों में रहता हूँ ।।
मुकम्मल हौसला होता ही नहीं
मैं तेरे दिए सबक सारे पढ़ता हूँ ।।
है कहीं तो आके थाम ले बावा
मैं बिखरा हुआ गुहार करता हूँ।।

क्षमा बावा के लिए

तप्त सूर्य रश्मि ने आ कर
आर्द्र, नयन से शोख लिया।
तब पथराए नयन कुँज ने
द्रवित ही होना छोड़ दिया।।
जाने कहाँ भटकती होंगी
अब चिड़ियाँ तेरे कमरे की
झंझावातों की हलचल ने
ठोस ठिकाना तोड़ दिया।।
मंदिर के उस कोने में
अब बेहद सन्नाटा पसरा
तेरे जाने भर से बावा
बच्चों ने आना छोड़ दिया।।
सघन निशा की चंद्र बिंदी को
पौंछ गया एक काला बादल
टिमटिम करते तारों ने भी
नभ पर छाना छोड़ दिया।।
पहले सूरज चढ़ जाता था
पूरा पहाड़ कविताओं में
पर ऐसे सुंदर लेखक ने
कलम उठाना छोड़ दिया।
तप्त सूर्य रश्मि ने आ कर
आर्द्र, नयन से शोख लिया।
तब पथराए नयन कुँज ने
द्रवित ही होना छोड़ दिया।।

Wednesday, February 10, 2016

यह समाज आखिर चाहता क्या है ???

रहस्यमय और आपत्तिजन्य प्रेम जो समाज के सरोकारों से परे हो, मर्यादाओं में न बंधने जैसा हो, और जिसे करने में डर सताए फिर भी करने का मन हो, जिसमे एक-दूजे के लिए मर मिटने का जूनून हो और हर एक समय मदमस्त नैनों में डूबे रहने की आकंठ वृत्ति हो, श्रेष्ठ है। सामान्यतया इसके बुदबुदाने की उम्र किशोरवय के शरद के बाद आने वाला यौवन का वसंत होता है। और यहीं से व्यक्ति एक आदर्श नागरिक या आदर्श प्रेमी होने की राह चुनता है, कोई एक ही हो पाता है उत्कृष्ट प्रेमी और अधिकांशतः आदर्श नागरिक ज़्यादा बनते हैं, आदर्श प्रेमी बनने के रस्ते बड़ी अड़चने और हज़ार जोड़ी जूतों का दुःस्वप्न सदा सताता रहता है इसलिए लोग मध्य मार्गी हो कर, कुछ सूखे गुलाब किताबों में लिए कलटी काट लेते हैं।
दूसरा और आदर्श अवसर शादी के रूप में आता है जब वही आदर्श समाज उस दबे हुए रोमांच को पुनः वैधानिक तरीके से पुनर्स्थापित करने का प्रयास करता है और इसी प्रयास से हमारे समाज का संरचनात्मक ढांचा बहुतायत खड़ा हुआ है और ऐसा नहीं है कि इस तरह से सृजित प्रेम में ऊपर लिखे प्रेम आनंद का अवसर कम हो किन्तु आदमी ढूंढता वह है जो हो नहीं सका। किन्तु अभिन्न सत्य है की सामाजिक रीति से हुए विवाहो में इस उत्कृष्ट प्रेम के अनगिनत अवसर आते हैं जो चेतना में प्रेम के उसी अनचाहे डर और उससे परे एक दूसरे पर मर मिटने की चाहत लिए फलसफे से बने होते हैं।
8th Feb मेरी और श्वेता की शादी की पांचवी वर्षगांठ, और हम उपरोक्त प्रेम के अवसर तलाशते हुए अब भी पाये जा सकते हैं, छुपा के जमा किये पैसो से उसने कलाई पर बाँधने के लिए वक़्त का तोहफा दिया है, एक डर तो यह की फिजूल खर्ची पर १० मिनट का भाषण, पैसे छुपाने की आदत पर नैतिकता का पाठ और उस से कहीं ऊपर प्रेम की नूतन अभिव्यक्ति। और चूँकि दो छोटे बच्चे अब हमारे जीवन के प्रसून हैं साथ ही दोनों ही आदर्श समाज की भूमिका निभाने में बेहद माहिर। प्रेम के अवसरों को तलाशना, ताड़ना और किंचित पा भी जाना हो जाता है किन्तु तभी दरवाजे पर घंटी बज जाती है, मन कचोट जाता है अब यह समाज आखिर चाहता क्या है ???

Friday, January 8, 2016

लव लव लव लवेरिया हुआ..

लव लव लव लवेरिया हुआ... नए साल के आगाज़ में जगह-जगह बगीचों में नव युगलों का गलबहियाँ करना शहरों में आम हो चला है। लेकिन ऐसी घटनाएँ कभी-२ वैज्ञानिक पहलुओं पर विचार करने पर विवस करती हैं।
मुझे पता नहीं नाना पाटेकर पर फिल्माए इस गीत में फिल्म राजू बन गया जेंटलमेन के कथा लेखक/ गीतकार ने इस जुमले की अटकल कैसे लगाई किन्तु आज मैं इस के जरिये मेडिकल क्षेत्र की ऐसी खोज की घोषणा करने जा रहा हूँ जो न्यूटन के अविष्कार की तरह महत्वपूर्ण और पेड़ से टपकी हुई है।
यह एक ऐसा तथ्य है जिसके जानने के बाद स्वास्थ्य के प्रति गंभीर व्यक्ति लवेरिया से दूरी बनाना शुरू कर देंगे। विस्मित होंगे, खास तौर पर मेरे मित्र जो नवोदित युवा हैं या इसी उम्र के आस-पास हैं, कदाचित सुकूनमय दांपत्य जीवन जी रहे जोड़े भी इस रोग के गंभीर परिणामों के बारे में जानना तो चाहेंगे क्यूंकि उनके जीवन में भी जब लवेरिया नाम का वायरस अति सक्रिय हो जाता है जो कि अक्सर सर्दिओं और गर्मिओं की छुट्टीओं में फीमेल sentimatia और children requestaform की विचारों के इर्द-गिर्द जमा होने की वजह से होता है और उन्हें घूमने किसी प्राकृतिक स्थल पर जाने को प्रेरित करता है।
चलिए अब मुद्दे की बात बताते हुए आज के अविष्कार को घोषित कर दूँ। (संभवतः आप इसे अपने बच्चों के सिलेबस में निकट भविष्य में ज़रूर पाएँगे ।) तो बता दूँ कि लवेरिया शब्द मलेरिया से उपजा नहीं बल्कि यह मलेरिया बीमारी की प्राथमिक स्थिति है और मलेरिया से पहले ही विद्यमान होता है। जब दो प्रेमी अपनी उत्कंठ आकर्षण वृत्ति के कारण किसी उपवन में घने वृक्षों के नीचे पड़ी बेंच पर नैनों की उथली झीलों में डूबते निकलते हैं तब इन झीलों में लम्बे समय से जमा कीचड़ के समीप मच्छरों का व्याप्त होना स्वाभाविक होता है और ये प्रेमीजन एक दूसरे में संलिप्त लवेरिया में इतने तल्लीन होते हैं की कब मच्छर इनके अंगोपांगों को इतनी जगह चूमते हैं की लवेरिया कब मलेरिया बन जाता है पता ही नहीं चलता। अविष्कार ये भी सिद्ध करता है कि मलेरिया जो जघन्य है स्वास्थ्य उपचारों से ठीक हो सकता है पर यदि प्राथमिक बीमारी लवेरिया एक बार हुई तो कितने ही कैलेंडर बदलें, ठीक नहीं होती और लाइलाज है। नववर्ष आपके जीवन में लवेरिया फैलाये किन्तु सावधान इसे अपने घर में पनपने दें, बागों में बहार के साथ मादा एनोफिलीज़ भी है। .......Happy 2016 !!!!
-राकेश जैन
( भारत वन मुंबई में संध्या भ्रमण के समय उपजा एक व्यंग्य )

Friday, November 27, 2015

गीत हमने कहे नहीं,
रागिनी गाई नहीं;
स्वागत में बस एक,
मन ही बिछोना था;
मन को पढ़ लिया,
और तुम आ गई।
अनोखे से जीवन में,
क्रांति है क्षण-२ में ;
साहस के अंतस में ,
स्वप्न एक सलोना था;
हिम्मत को दाद दी ,
और तुम आ गई।
छत जब उधड़ गई,
वो आसमान बन गई ;
वृष्टि ने सूरज संग,
एक बीज बोया था;
बुलबुल ने पेड़ चुना;
चहकने को आ गई।
कहाँ से चले थे और,
कहाँ कदम ठिठक गए;
लड़खड़ाते क़दमों ने फिर,
ताल को सजोया था ;
ताल में तल्लीन हो,
थिरकने को आ गई।
दुर्गम में सुगमता,
लक्ष्य में एकाग्रता;
आशीष की प्रवलता,
बावा की बुलबुल* वो;
चंचल सी दृष्टि लिए,
एनाक्षी* आ गई।
* एनाक्षी - सुन्दर नयनो वाली, मृगनयनी
* बुलबुल- चहकने के लिए प्रिसिद्ध चिड़िया,मुनिश्री को चिड़िया से बहुत स्नेह है।

Wednesday, September 16, 2015

IIनिःस्वार्थ।।

यह कहता,  
बैठी रहो 
अंदर  आओ 
दाना खाओ। 
रोज़ की तरह
आज भी 
सुनने से पहले 
गौरैया 
उड़ गई। 
यह रोज़ 
का क्रम है, 
वो जैसे 
आती ही 
बस 
मुझे देखने 
को है -

निःस्वार्थ।।

Friday, July 24, 2015














प्रेयसी, परिणिता हुई, 
हो गई धडकन साथ।
जाऊँ अब में कहीं,
होती है वो साथ।।.

चेहरा उसका सामने, 
नहीं नज़र से दूर।
स्वप्न सुंदरी वही है,
वो खुली पलक का नूर।।

मुझको उसका चाहना,
जैसे चातक की चाह।
ह्रदय बना है नाविका,
बनी है वो मल्लाह।।

साँस साँस का साथ ये,
जब तक सांसों में साँस।
उसकी इतनी आस है,
मेरा है विश्वास।।

Saturday, April 5, 2014

हे महासिंधु ! तेरी विनय में



प. पू. मुनि श्री क्षमा सागर जी के लिए 

(मुनिश्री की वाणी और प्रवचन इतने प्रभावशाली हैं कि वो जन मानस में नवचेतना का प्रसार करते हैं, विदित हो कि मुनिश्री के स्वास्थगत कारणो से उनके कंठ से वर्त्तमान में स्वर नहीं निकलता)

कंठ में उत्साह था तो 
बोल कर सब को बताया।
थक गया जो कंठ तो,
फिर नेत्रों ने बीड़ा उठाया।। 

वो समंदर है अतुल बल
भावना का अथक संबल।
तब बोल कर वो बांटता था
नज़रों से है वो अब लुटाता।।

शब्द शायद सोचते हों
फिर उन्हें चूमे अधर।
अंदर घुमड़ कर बादलों से
जाते होंगे अब वो सिमट।।

वो नेह का दीपक सलोना
उनको भी ढांढस बाँधता है।
उम्मीद से ख़ुद को संजो कर
जग को वो हिम्मत बाँटता है। .

मैं जब मिला और पूछा उनसे
क्या है मुझे अब तेरी आज्ञा।
"कुछ भी नहीं " में सर हिलाकर
आशीष को बस कर उठाता।।

हे महासिंधु ! तेरी विनय में
गीत लिख पाता नहीं हूँ।
तुम मौन रहकर बोलते हो
मैं बोलकर कह पाता नहीं हूँ।।

Saturday, February 22, 2014

गाओ सप्तक, धड्को धकधक

इत्तेफाक होते रहेंगे,
ज़िन्दगी चलती रहेगी 
सब कुछ चले मन के मुताबिक 
सोचने से कुछ न चलेगा। 

रास्ते पथरीले हों या 
रास्ते सुगम सहज हों 
हौसले मे चलना हो तो 
मंजिलों पर जा मिलेगा। 

कौन था जो न चला हो
और पहुँचा हो शिखर तक
केवल वो जो मान बैठे
मैं पहले ही पहुंचा हुआ था।

बात बेमानी भी नहीं है
सोच लो तो ये भी सच है
तू जहाँ पहुंचा हुआ है
कोई उस तक दौड़ता है।

हर पथिक का है नजरिया
हर पथिक की अपनी दुविधा
सत्य को जो खोज लेगा
वही इससे पार चुकता।

सहज न तो रास्ते हैं
न सहज चलना निरंतर
ठहर कर मन को मनाना
और भी है कार्य दुर्गम

कुछ भी नहीं है नियत वैसा
सोचा जैसा, देखा जैसा
होना अचंभित, चकित होना
नहीं हल है ज़िन्दगी का

बस चला चल,
लहर जैसे बिना सोचे
चलती आती
और खोती खुद को खुद में
अंतस मना में मौज खाती

डूब जाती, तैर जाती
और किनारों को बताती
रे कठिनतर, कठोर पत्थर
मुझ निर्मला से करो प्रणय

घुलना सीखो , मिटना सीखो
तैरना और, डूबना भी
आई चलकर इसलिए हूँ
चलना निरंतर है मयस्सर

वरना मैं उसकी गोद में थी
जो है बृहत , बहुतों की मंजिल
मेरे साहिल, छोड़ जिद (कठोरपन),
करदे समर्पण , मौन क्यूँ हो.

गाओ सप्तक, धड्को धकधक
थाप दो , बोलो छप -छप
मुस्कुराओ , तैर जाओ,
करदे समर्पण, करदे समर्पण

-राकेश

Sunday, December 30, 2012

।।सादर श्रद्धांजली।।













।।सादर श्रद्धांजली।।

 
इसने-उसने

जिसने चाहा

जो चाहा

कह डाला है,

वो मौन हो गई

ज़हर पी लिया

जीवन का

अब मृत्यु ही

अंतिम हाला है।



ईश्वर ने

जो चुना अंत में

वह इंसाफ

ज़ुरूरी था

तार-2 हो,

इस दुनिया में

वरना रोज़

उधडती वो।



जो हुआ

घिनौना

एक बार तो

हर माँ-बहिना है

घायल,

हर रोज़

फब्तियां सुनती

तो फिर

कैसे सहती

वो मुश्किल।



चिर शांति के

पन्ने श्वेत

उस बिटिया

को रखो समेट,

अपने पन्ने

रखना बंद

ताकि वो न

हो शर्मिंद।








Tuesday, April 24, 2012

अखबार

अब अखबार मंगाने मे


लगता है डर...

एक रोज़ गलती से,

पड़ गया पानी,

शब्द स्याही कि जगह,

लहू बन के बह निकले..

कुछ और नहीं होता,

मौत और मौत,

बस मौत छपी होती है,

झरोखे सी कोई जगह हो

तो कोइ अबला,

इज्ज़त के लिए रोती है..

कोई छोड़ गया होता है

रोता हुआ बच्चा,

किसी माँ का तो आता ही नहीं

जो पढने गया था सुबहा.

कोई मुक्कम्मल सी बजह नहीं

कि अब अख़बार पढ़ें घर में

अब तो दिल पत्थर का हो तो

अख़बार लगे घर में..

कि ख़बर पढ़ता हूँ, तभी

बेटी को जाना होता है स्कूल,

सहम कर भेज तो देता हूँ

फिर पलटता हूँ वही ख़बरें,,

कि दुपट्टा ओढ़ के गई थी,

मगर झीना था बहुत..

फाड़ के वसन, चीर ली इज्ज़त,

अज्ञात थे कोई पता नहीं पाया,

पुलिस ने पड़ताल करी,

हाथ नहीं कुछ आया.

अब अखबार मंगाने मे

लगता है डर...

एक रोज़ गलती से,

पड़ गया पानी,

शब्द स्याही कि जगह,

लहू बन के बह निकले..

Sunday, March 18, 2012

प्रिय पत्नी स्वेता के लिए जो मुझसे दूर है... इस समय।
बड़ा बेसब्र है वो मेरी इनायतें पाने को,
वक़्त पीछे पड़ा है , उसकी ऐ कशिश आजमाने को।
वो रोता बहुत है मेरे पास आने को,
वक़्त उसे रुलाता बहुत है आजमाने को॥

मैं कहता हूँ हौसला बढाने को,
वो लड़ता है मुझसे ऐ दिलासा दिलाने को।
वो नहीं है तो सेहरा तो मेरी ज़िन्दगी भी है,
वो रो कर लगा है उसे दरिया बनाने को॥
घट रहा कुछ इस क़द्र,न देखा, न सोचा था कभी,
वक़्त के पैतरें हैं सब सबक सिखाने को।
मेरा फरमान है ज़रा चुप कर, सम्हल जा साथी,
सिर्फ आंसू तो नाकाफी हैं, यूँ दरिया बनाने को॥
आरज़ू रख,अमल में ला, कि सब खैरियत ही है,
देखना है कितना और है वक़्त बदल जाने को।
हम बने एक दूजे के लिए,है वक़्त का ही करम,
दूर रख कर भी वो, देगा कोई नूर हमे सजाने को।
हम नीड़ बसायेंगे जो साथ मिला है हम-दम,
दूरियां मिट जाएँगी बखुद, सपना ऐ सजाने को.......




Saturday, October 22, 2011

प्रिय कविता के लिए!!!

इस बात पर न रख सवाल के अब तक कहाँ रहे...
बस पूछ लो कि अब हाल कैसा है....!?

प्रिय कविता के लिए!


अतीत में, कविता अक्सर ही,
करती थी चुहल,
रंगरेलिओं की पहल।
आकर, छू लेती थी सअधिकार,
और चूम कर अंकित कर देती थी,
उसके दहकते होंठ, मेरे चेहरे पे कई बार।
मेरे पलंग, मेरे सिरहाने में,
मेरी Diary के लिहाफ में अक्सर ही,
दुबक और निकल आती थी;
और रगड़ खाती थी मुझसे, मेरे स्नानागार मे,
छुपकर तौलिए के बीच।
मेरी ज़िन्दगी का सुख-दुःख अक्सर कहती
नज़र आती थी महफिलों के बीच॥
बहुत चाहती थी और शायद अब भी चाहती है,
मगर जब से हुई है मेरी शादी,
वो रखने लगी है अंतर ,
झाँक कर रोशनदान से,
अक्सर ही लौट जाती है - "उदासमना"
घबराती है आलिंगन से,
और हिचकिचाहट में भर जाती है,
देख कर किसी और को उसके और मेरे बीच॥
आज मेरी पत्नी गई थी कहीं बाहर,
और मौका पाते ही आगई है वो (कविता),
एकांत को देने सहारा, और कहने आप बीती,
इस बीच मेरी पत्नी आ चुकी है वापस,
और उसने रंगे हाथ पकड़ ली हैं ये कन्फुसियां॥
वो (पत्नी) मुस्कराकर चली गई है अन्दर,
हमे देकर एक मौन स्वीकृति,
बिताने के लिए कुछ समय साथ-२॥



Sunday, May 29, 2011

वो जीते जी रहे नहीं, वो मरे हुए से हैं...

मित्रो! एक लम्बे अन्तराल के उपरांत एक कविता प्रेषित कर रहा हूँ, जो एक एसे व्यक्ति की अंतर्व्यथा है, जिसे ज़माना इस्तेमाल करना चाहता है, पर उसके इस इस्तेमाल से ज़माना खुद को ही छलता है....


यह कविता सिगरेटके शौकीनों के लिए चेतावनी भी है,,,






लोग खाक छानते रहे,
मैं धुआं हो गया।
वो मलते रहे उँगलियों मे,
मैं हवा हो गया॥
वो जलाते रहे,
उड़ाते रहे,
बना के गुल रास्ते में ,
मुझको झडाते रहे॥
बदन को पीते रहे,
शेष को,जूते से दबाते रहे।
वो नादान,
बेजान समझते थे मुझे,
मुझे जलाते तो रहे,
खुद को सुलगाते भी रहे।
मैं बुझ कर भी बुझा नहीं,
वो पीकर मुझे बुझे से हैं॥
मैं खाक रह गया हूँ,
या हो गया हूँ धुआं
वो जीते जी रहे नहीं,
वो मरे हुए से हैं॥

Tuesday, February 1, 2011

तुम पर लिख दूं सुन्दर कविता....




प्रेयषी जो अर्धांगनी होने को है....


तुम पर लिख दूँ सुन्दर कविता,

शब्दों का श्रंगार करूँ॥

आ कर बैठो, मेरे सम्मुख,

तुम से नैना चार

शर्म हया की चादर छोड़ो,

तो थोडा खुल कर प्यार करूँ॥

हाथों मे हाथों को डालूँ,

परिणय को स्वीकार करूँ॥

झुकी पलक और नीची गर्दन,

क्या तेरा मनुहार करूँ॥

तुम पर लिख दूँ सुन्दर कविता,

शब्दों का श्रृंगार करूँ॥

अपना कह कर ह्रदय बसाया,

क्या इसका बिस्तार करूँ?

नम पलकों मे मुझे बिठाया,

क्या इसका आभार करूँ,

तुम पर लिख दूं सुन्दर कविता....


Saturday, August 21, 2010

सूरज लौट गया संध्या आने पर..


एक कविता मेरे एकांत जीवन से ....>>>>>>>
सूरज लौट गया,
संध्या आने पर।
अपने घर जाता...
कितनी सांझें बीती,
पर हमको कौन बुलाता
दिन-रात बना क्रम,
चंदा-सूरज,
अपनी-अपनी राह पकड़ते...
हम गतिहीन आसमाँ होकर,
एक जगह पर डेरा करते॥
दूर मातु और पिता योग से,
एकांत निविर मे ढूंढे साता....
मन विचलित पर,
कौंध-२ कर,
प्रश्न एक ही करता जाता,
सूरज लौट गया,
संध्या आने पर,
अपने घर जाता॥
कितनी सांझें बीती पर,
हमको कौन बुलाता॥
रजनीकाल में जुग-जुग तारे,
पाँव पसारे नभ में सोते,
सुबह-सुबह चल देते निजपथ,
पर हमे कौन????
निज पथ बतलाता॥
सूरज लौट गया,
संध्या आने पर,
अपने घर जाता.....
कितनी सांझें बीती पर,
हमको कौन बुलाता...??

Sunday, August 8, 2010

आदमी अब आदमी सा नहीं लगता

दिल घबरा सा रहा है, पर भी लिखा जा रहा है--------

पथरा गए हैं पेड़,

पत्तियां हो गयीं है चिमनियाँ।

रहा नहीं सुरक्षित ठहरना,पास,

दिन में भी रात में भी

सदा उगलती है CO2 गैस

नहीं बरसता h2o अब,

H2So4 की होती है,

मिली जुली वर्षा॥

granite के बगीचों में,

ठंडक नहीं होती है

होता है ज्वर सा कठिन ताप॥

बच्चों की शक्ल में,

पैदा होने लगे हैं रोबोट॥

आदमी हो गया है,

अर्ध मशीनी पुर्जा,

कठिन है ढूंढ़ पाना ठौर॥

दोपहर उग आती है,

सुबह के सूरज के साथ,

सबेरा अब सबेरा सा नहीं होता॥

घरों पर उगने लगा है,

टी.वी का छत्ता,

दादी ने बताया था,

खपरैल घरों में बारिश में,

उगा करता था, इसी शक्ल में कुकुर मुत्ता॥

छत्ता किरने खींच -२ कर दिखाता है,

बहु रंगी चित्र,

जिसमे बस अपना चेहरा नहीं होता॥

नज़रों और सितारों के बीच,

छाई रहती है, धुंए की परत,

सफ़ेद अब हो गया है off-white ।

अब आँगन में उगता है,

नीम का बोनसाई,

जिसकी छाओं में बमुश्किल,

सो पता है पालतू कुत्ता,

रोटी गोल नहीं रही,

हो गयी है चप्पल्नुमा,

खाने लगा है आदमी जाने क्या-२॥

कब्र में भी, अब,

महफूज़ नहीं हैं लाशें॥

आंसू बहाने के लिए,

आँखों में डालने पड़ते हैं स्प्रे॥

और हंसने के लिए अब चाहिए,

laughing गैस,

इतना बनावटी हो गया है, सब,

कि आदमी अब आदमी सा नहीं लगता॥

Saturday, July 24, 2010

प्यारी कंचन दी!

प्यारी कंचन दी!

एक दुआ कि साहित्य के आसमान पर चंदा की तरह चमको॥

जन्म दिवस की शुभ कामना ,

सिंदूरी माहताब देता,
दूधिया आफ़ताब देता,
उसकी हर आरज़ू का,
मैं यूँ जवाब देता..
वो दूर, है पर,
ग़र मेरे करीब होता,
गुलशन का हर ऐक,
उसको हसीं ग़ुलाब देता..
वो है हसीं शख्स ख़ुद,
मांगेगा न मुझसे,ऐ सब,
सोचता हूँ मैं तब,
उसे कैसे नवाज़ देता..
जो आसमान सा बृहत,
जो सूरज सा उज्जवल,
उसे मैं क्या सवाब देता..
जिसने रखे सजो कर,
ग़म भी जैसे मोती,
उस इंसानियत के बुत को,
मैं क्या लिहाफ देता..
सब सोच कर फिर सोचा,
दूंगा नहीं मैं उसको,
कुछ मांगता हूँ उससे,
क्या वो हसीन मुझ को,
एक वादा शुमार देगा,
हँसता रहेगा हर दम,
ये बात मान लेगा..
कितनी रहेगी मुश्किल,
तूफ़ान भी घिरेंगे,
वो हो कर के सबसे आगे,
क़िश्ती निकाल लेगा॥

सिंदूरी माहताब देता,

दूधिया आफ़ताब देता,

उसकी हर आरज़ू का,

मैं यूँ जवाब देता॥


Sunday, June 27, 2010

कविताएँ..

अपनी diary के पन्नों को पलट रहा हूँ, सोचा ये दो कविताएँ आपसे भी बाँटू ....

१) तितलियाँ.....

दरवाजा खुलने की आहट हो,

कि लगता है, तुम आई हो॥

तुम तो जानती हो कि,

मैं भूल जाता हूँ॥

भूल जाता हूँ कि,

तितलियों के आने में,

न आहट जुरुरी है,

न दरवाजा खुलना॥

बस जुरुरी है तो इतना,

कि अन्दर कोई महक,

उनका स्वागत कर रही हो॥

वो आ जाती हैं,दरख्तों से,

झोंको से,वातायनों से,

और नहीं तो वो पैदा हो जाती है,

उस ख़ुश्बू मे खुद -ब-खुद,

अभी-अभी,जैसा हुआ॥

२) मैं!

मैं एक ऐसी क़िताब हूँ,

जिसकी आवरण पृष्ट के अलावा,

सारी पृविष्टियाँ सबल हैं॥

और वो एक ऐसी क़िताब हैं,,

जिनकी आवरण पृष्ट के अलावा,

सारी पृविष्टियाँ,शून्य॥

मगर वो सफल हैं,

क्यूंकि इस दौर में,

भीतर झाँकना कौन चाहता है॥

दो क्षणिकाएं...

१)तुम रोया मत करो

आंसुओं को,

शर्मिंदगी महसूस होती है,

झूठा रोना रोने में॥

२) गलियाँ मौन इसलिए नहीं,

कि बहुत देर से कोई गुज़रा नहीं॥

बल्कि यूँ, कि वो गुजरने वालों से,

अब बात नहीं करती॥

Sunday, June 20, 2010

मौन क्यूँ हो, बोल दो

तुम्हारे लिए!

मौन क्यूँ हो?
बोल दो !
पट खोल दो।
अधरों से कह दो,
कुछ कहें॥
नैनों को कह दो,
झांक लें,
पलकों से बाहर।
कह दो उन्हें,
हमें देख लें॥
केश लहराओ ज़रा,
फैला दो उन्हें,
कि आकर वो हम तक,
चेहरा हमारा चूम लें॥
मैं हूँ, व्याकुल,
चिंतित और आकुल,
अपने ह्रदय से कहो,
आकर हमे वो चैन दे॥
दे दो सहारा,
छू कर मुझे तुम,
हम खो कर स्वयं को,
तुम से तुम्ही को,
छीन लें॥

मौन क्यूँ हो?
बोल दो !
पट खोल दो।
अधरों से कह दो,
कुछ कहें॥

न करें अठखेलियाँ,
अब जान जाती है,
हलक से,
पास आकर बैठ लें,
थोडा हमे वो प्यार दे,,,,