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लीजिए पेश है एक और कविता,
"दाह संस्कार"
मिटटी, मिटटी हो जायेगी,
चेतन पंछी होते ही॥
आग लगेगी उस कोठी मे,
जिस मे चेतन रहता था॥
अचेतन के इसे होंगे हालात,
घर मे रखने से इंकार॥
खो जाएगा, और फ़ना हो जाएगा,
निज जन, निज मन का प्यार॥
(कृमशः)
मेरे मरने के बाद,
क्रम को और आगे बढाते हुए लीजिए पेश है मेरी इस श्रृंख्ला कि एक और रचना,
"अन्तिम यात्रा "
जाने कांधे किसके होंगे,
मेरी मिटटी कि अर्थी में,
जाने कौन जलाएगा,
मेरा झूठापन ,
आग लगा कर अर्थी में,
कौन कपाल क्रिया करेगा,
कौन लगायेगा फेरे॥
मैं तो बीत चुकूंगा तभ तक ,
फिर साथ रहा क्या, इस जग का मेरे॥
व्यवसाय यही था जीवन जब था,
संबंधों मे भेद पाटना ,
कहना कुछ को बहुत पराया,
कुछ को जतलाना ये मेरे॥
आँख मूंदने पर सब आए,
जो थे बहुत पराये कल तक,
या जिनको कहता था अपने- मेरे॥
भेद दृष्टि का ,
लेकर जाना नही भलाई मेरे साथी,
तुम मुक्तिपथ मे मुझे छोड़ कर,
क्षमा ह्रदय से करते जाना ,
निर्विकल्प मे विदा ले सकूं,
जीवन का न हो फिर दोहराना॥
(कृमशः)
और भी बहुत कुछ मेरे सोचे अनुरूप लिखूंगा अगला पायदान है "दाह संस्कार" ।
मेरे मरने के बाद,
प्रिय जनों ! श्रृंख्ला को आगे बढाते हुए आपके लिए एक नव कविता प्रेषित कर रहा हूँ, मेरी इस श्रृंख्ला के सच शायद आपने भी अपने चारों ओर देखे हों , दाबे के साथ नही कहूँगा , क्यूंकि मृत्यु से जुड़ी हुई घटनाओं को कौन कितने करीब से देखता ,ये कहा नही जा सकता ॥
चलिए मैं कोशिश करता हूँ ,आपसे कुछ कहने का,
उन्मान है ,
"मानवता "
पड़ोसी,
तंग हाल ,
कंजूस,
कैसा भी हो !
पर उसे,
हमारे सारे ,
रिश्ते दारों को ,
उसके ख़ुद के ,
फ़ोन से
ख़बर लगाना
कितना !
कष्टप्रद होगा ??!!
(कृमशः)
अगला पायदान है - अन्तिम यात्रा, जुरूर आइये मेरे ब्लॉग पर॥
दोस्तो ! अक्सर अपनी मृत्यु के बारे मे बात करने को अपशकुन कहा जाता है, पर मैं मानता हूँ ये जीवन उसी महोत्सव कि एक तैयारी है फिर इस पर सोचने, बात करने मे अपशकुन कैसा, ये तो हकीकत को समझने का एक प्रयास है... मैं अब आपसे कुछ ऐसी ही कवितायें कहूँगा जो मृत्यु के बाद के सच से जुड़ी है, हाँ ! मेरी मृत्यु और उससे जुड़े सच, कुछ कड़वे -कुछ मीठे सच,
आप सभी इसमे अपने लिए भी कुछ सच तलाश सकते हैं... वरना ये मेरा सच तो है ही ! साथ ही एक कयाश भी है कि क्या-२ हो सकता है -
"मेरे मरने के बाद
इस श्रंखला की पहली रचना,
(होगी नई शुरुआत आगे की )
सुई मे धागा पिरोने के बाद,
इंजन मे तेल पहुँचने के बाद,
बर्तन के तप चुकने के बाद,
क्या होता है ?
होगा वैसा ही कुछ,
मेरे बाद॥
क्यूंकि मैं पहुँच जाने का नाम नही हूँ,
क्यूंकि मैं रुक जाने का नाम नही हूँ ..
गतिवत हो जाना, गति पा लेना,
क्रम बदल जाए पर,
नियति पर हो ध्यान॥
ये ही है मेरा आगाज़,
मेरा अंदाज़,
सोचो क्या होगा ??
मेरा ! तेरा ! सबका !
कब ??
मेरे मर जाने के बाद ॥
होगा नव आगाज़॥
(कृमशः)

आशा के दीप जलाए थे,
मेरे जीवन मे आकर,
आशा के रंग सजाये थे ..
मैं तो रह लेता था ,
अंधरे कमरे मे घुट कर,
तुम ही हाथ पकड़ कर एक दिन,
मुझको बाहर लाये थे॥
तुमने ही तो आ कर मुझ तक,
आशा के दीप जलाये थे॥
मैंने तो रोका था तुमको,
अपने घर के बाहर ही,
पर आकर अन्दर तुमने ही,
सुंदर गीत सजाये थे॥
तुमने ही तो आ कर मुझ तक ,
आशा के दीप जलाए थे॥
मैं तो रो लेता था,
अपने घुटनों पर सर रख के,
पहली बार यहाँ आकर,तुमने ही!
अश्को पर प्रतिबन्ध लगाये थे,
तुमने ही तो आ कर मुझ तक,
आशा के दीप जलाये थे॥
मैंने कर लिए, बारह दर्जे पास ॥
अव्वल आकर,
पर आज, मेरी पहचान
मेधावी छात्रा न हो कर,
हो गई है,
युवा देहलीज पर,
दस्तक देती,
भारत माँ की ,
भारतीय बेटी॥
कर्तव्यनिष्ठ पिता की ,
जिम्मेदारियां भी जैसे,
उभर आई हैं यकायक॥
रिश्तेदार आ-आकर
माँ-बावा से करने लगे हैं,
कन्फुसियाँ॥
और माँ- बावा भी,
रोज़ रात मेरे सोने के बाद ,
गिनते हैं रुपये,
कनस्तर मे जमा-
रकम॥
माँ कहती है रोज़,
जैसे भी हो इस बरस तो,
करने ही होंगे ,
बेटी के हाथ पीले॥
मैं करवट बदल
तकिये मे छिपाती हूँ मुह ,
और अपनी प्रतिभाओं को ,
बहाने कि कोशिश ,
आंसुओं के जरिये ॥
और ख़ुद को मौन रह कर
समझाने कि कोशिश,
मध्यम वर्गीय परिवार मे
बेटी होना ऐसा ही एक क्रम है॥
जिसे आज से तकरीबन
अठारह बरस पहले ,
मेरी माँ ने निभाया व आज मुझे ,
निभाना होगा !!
मौन रह कर ॥
क्यूंकि ये संस्कार
माँ के दूध ,
और पिता के खून,
के जरिये मेरे मुख पर
पड़ गए हैं।
बंद ताले की तरह॥!!
१) योग्यता के आभाव में,,
मैं कैसे दूँ उन्हें !
आमंत्रण।
कहते हैं,
शेरनी का दूध रखने को,
सोने का पात्र चाहिए॥
मेरी लकड़ी कि कठोती ,
पात्रता के आभाव मे ,
मौन हो गई है,
आहिस्ता से॥
२) मैं समझा नही
उसे, या
वो समझे नही
मुझे॥
नहीं पता,
पता है तो सिर्फ़ यह,
कि कहीं न कहीं
समझ का फर्क है॥
३) दिल.
कुछ एक ऐसा हैं,
जिसे टूटने पर
रखा नही जाता ॥
कुछ एक ऐसा है
जिसे टूटने पर
फेंका नही जाता॥
कितना फर्क है,
जिस्म के भीतर ,
और जिस्म के बाहर ,
दुनिया में॥
मेरी माँ, दूर हो कर भी देती है साहस,
सदा चलते रहने की सीख॥
सदा खुश रहने कि प्रेरणा,
और बिखेरती है यादों मे प्रीति॥
मेरी माँ अक्सर मेरी आंखों मे आती है,
और आंसू बन बह जाती है॥
मेरी माँ इस तरह से,
मुझको अक्सर नम कर जाती है॥
मेरी माँ आती है सुबह-२ ,
भावनाओं के जरिये पिलाती है चाय॥
मेरी माँ मेरा खाना पकाने मे हाथ batati है,
मुझे बगल मे baithatee aur परोसकर खिलाती है॥
मेरी माँ कितनी अच्छी है,
जो दूर हो कर भी बिलकुल करीब रहती ॥
aaj से सात साल पहले जब पढ़ने घर से निकला tabhi का एक unmaan है ये कविता..
माँ ने कहा है ,खोजना सच॥
खूब पढ़ना और, बनना सफल आदमी॥
समय पर रोटी खाना,
भूखे मत सोना,
घर कि चिंता मत करना॥
मैंने मौन हो कर सुना,
मुस्कराया और चला आया॥
कैसे कहूँ माँ से-
मुश्किल बहुत है खोजना सच ,
पढ़ना और बनना आदमी॥
समय पर तो माँ खिलाती है रोटी,
यहाँ तो भूखा सोना अनिवार्य है॥
रही घर कि चिंता , तो क्यों न हो !?
क्या इस घर के अलावा, कहीं कुछ है,
जो मेरा है॥
यही सच है, माँ तेरी दुआ मेरा साथ देगी॥
तकदीर बदलेगी,
देखना तेरा बेटा सफल आदमी बनेगा,
जब तक तेरा सिर गौरव से न उठे,
चैन की साँस नही लेगा॥
मैं फिर लिखना चाहता हूँ,
सुन्दर कविता !!
फिर लिखने से पहले,
रुक जाता हूँ ये सोचकर-
क्या तुम फिर वापस आओगी ??
पहनोगी मेरे शब्दों के लिबास,
सुहाग की लाल साड़ी उतारकर ..
क्या sajaogi अपनी मांग मे-
मेरा शब्द सिन्दूर,
सुहाग की लाल रोली निकाल कर ॥
मेरा मन है लिखूं सुन्दर कविता,
तो क्या ! ? तुम फिर वापस आओगी ॥
kya पहनोगी मेरी धडकनों के-
jhanakte नुपुर,
अपनी सुहाग कि पायलें उतार कर॥
मेरी शब्द बाहें पड़ते ही utaarni होगी-
स्वर्ण मेखला,
सुहाग का मंगल सूत्र ॥
क्या तुम वापस आओगी !!?
पूछता है मन,क्यूंकि
में फिर लिखना चाहता हूँ,
एक सुन्दर कविता ..
मैं सोचता हूँ-
इतना,कि
सोचकर थक जाता हूँ॥
मैं सोचता क्यों हूँ !? इतना,
मैं ये भी सोचता हूँ॥
पता नही तुम्हे,कि
अगर न सोचता मैं तो,
मैं सोचता बस इतना ,कि
मैं ज़्यादा सोचता नहीं हूँ॥
मैं बीमार तो नहीं हूँ !?
तुम सोचते होगे॥
मगर सोच होती अगर बीमारी,
तो तुम क्यों सोचते मेरे लिए !! ऐसा
मुझे यकीन है,
मेरा दोस्त बीमार नही हैं॥
मैं सोचता हूँ बस इतना,
कि मैं सोचता बहुत हूँ !!
मेरी यह कविता मेरे बचपन से जुड़ी है, साथ ही इस के अन्दर हमारी परम्पराओं और संस्कृति की खुशबु भी महकती है,मध्य भारत मे एक परम्परा है अक्षय तृतीय पर विवाह संपन्न करने की , और यह परम्परा बच्चों द्वारा प्रतीकात्मक रूप मे खेली जाती है, हम भी बचपन के उन दिनों मे पीपल के पेड़ के नीचे जाकर (हरदौल बावा के पास ) अपने माटी के गुड्डे -गुडिया का ब्याह रचाते थे, और अपने संगी-साथियों के साथ रोटी पन्ना खेलते थे ,इस खेल मे रोटियां झूठ की होती थी, पकवान भी काल्पनिक होते थे पर भावनाएं बहुत ही पवित्र और अंतरंग से निकली हुई होती थी ॥ लीजिए आप भी इस अनूठी चुहल भरी कविता का लुत्फ़ लीजिए-
आओ लाडो !
खेले हम-तुम,रोटी-पन्ना।
तुम ले आओ अपनी बन्नी ,
मैं ले आया अपना बन्ना ॥
सरकारी दफ्तर जाता है,
रुपये हज़ार कमाता है।
तेरी बन्नी को क्या आता है,
क्या अच्छा खाना बन पाता है ?
मेरा गुड्डा अच्छे खाने का है शौकीन,
रोज़ चाहिए मीठा, रोज़ खाए नमकीन।
खूब सोच लो ठाठ रहेगी,
मेरे घर मे आराम करेगी॥
मगर रुपैया लाख लगेगा,
घर गृहस्थी का साज लगेगा,
होती हो राजी तो आना ,
हम लाल चुनरिया डाल ही देंगे।
तेरी बन्नी को अपना मान ही लेंगे॥
आओ लाडो !
खेले हम-तुम,रोटी-पन्ना।
तुम ले आओ अपनी बन्नी,
मैं ले आया अपना बन्ना॥
रति के नयन हीरक जड़े,
मन स्वर्ण है, अभिलाष का॥
देखो बसंत की करनी को,
उच्चावचन यह स्वांस का॥
मदन की देखो दशा अब,
नयनो भरी है raktimaa..
बसंत धडके धडकनों me ,
मुश्किल हुआ सम्हालना॥
किस देवता की करें पूजा,
क्या अर्घ्य दूँ,उस पाद me॥
जो देवता,उजियार दे एक दीप,
मन के इस निर्वात men ..
हे ! देवता,यह ऋतू मादक,
कहतi प्रणय के पाठ नित॥
पर priy बैठे अजनबी बन,
मन पता puchhe कर Vinat..