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Sunday, April 5, 2009

अन्तिम यात्रा का सुख !


क्रम ताल मे आते हुए.... लीजिए मेरे चल रहे प्रयास का अगला सूत्र....

क्रम- मेरे मरने के बाद ॥

उनमान है, अन्तिम यात्रा का सुख !

सत्य स्वरूपी, मृत्यु जब,

महबूबा मेरी होगी,

क्या खूब घड़ी वह होगी !!

क्या खूब घड़ी वह होगी-

जब शयन करेगी काया,

घास-फूस के बिस्तर पर,

जो मखमल से नाज़ुक होगी॥

क्या खूब घड़ी वह होगी....

तान वितान चिर-निद्रा होगी,

आँख बंद जब होगी,

कंधा दे-२ लोग चलेंगे,

ऊँचे-नीचे पथ पर आगे,

मैं लेटा-२ झूलूँगा जब,

शान्ति संगिनी होगी॥

मुंह ढांके मैं श्वेत वसन से,

श्वांस स्वयं की लूँगा थाम,

ठंडे दिल को मौन देख कर,

तकलीफ किसी को न होगी॥

क्या खूब घड़ी वह होगी...

सत्य स्वरूपी मृत्यु जब,

महबूबा मेरी होगी॥

कस कर बाँध रखेंगे देह,

किंचित तकलीफ मुझे न होगी।

मौन साध कर दुनिया से जब,

देह जुदाई लेगी,

क्या खूब घड़ी वह होगी ,

सत्य स्वरूपी मृत्यु जब,

महबूबा मेरी होगी॥