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Sunday, July 6, 2008

थोड़ा तो पिघलिये

दोस्तों !

चार दिन हो गए , शहर अभी भी कर्फ्यू से आजाद नही हुआ, घंटे दो-घंटे की छूट जैसे ही मिलती है सड़के भर जाती हैं, पेट्रोल पम्प लुप्त हो जाते हैं। सब्जियों का दाम गुणात्मक बढ़ जाता है, दूध डेरी पर लम्बी पंक्तियाँ और इस बात का डर की कहीं दूध खत्म न हो जाए ,बेचैन कर देता है॥


मेरा शहर इस बेचैनी के साथ जी रहा है॥


इस कविता में एक अपील है अमन के लिए, शान्ति के लिए और अपने शहर को वापस अपने रुतबे मे देखने के लिए।


पथराइए नही,

पिघलने का प्रयास करिए॥


पिघलने लगें,


तो रुकिए नहीं,


बहने का प्रयास करिए॥


बहने लगें जैसे ही,


तो पहुँचने का प्रयास करिए॥


जब पहुंचे ,


तो इतराइए नही,


समष्टि मे मौन ,


खो जाने का प्रयास करिए॥


जब खोने लगें,


तो ख़ुद को,


भूल जाने का प्रयास करिए ॥


तो फिर चलिए,


अपनी यात्रा शुरू करिए,


थोड़ा तो पिघलिये॥


थोड़ा तो पिघलिये॥