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Sunday, May 3, 2009

कागज़ की गाय

पढ़ने वालों के लिए एक विचार केंद्रित कविता, जो आधुनिकजीवन शैली के बारे में आपसे एक सच बोलेगी॥
शीर्षक है, कागज़ की गाय-
गौर करियेगा-
कागज़ पृष्ठ से, मढे,
घृत के डिब्बे,
को ला कर,
अपने बर्तन मे ,
जब उडेला और,
फेंका वह रिक्त पात्र
बच्चे ने अकस्मात् ही पूछा,
माँ! यह देखो गाय,
माँ! गाय को यहाँ क्यूँ बनाया॥
गाय तो दूध देती है,
तब क्या, ! कागज़ की गाय,
घी देती है॥
माँ ने सुना , हँसा !!
और बस बताया,
की नहीं बेटा,
दूध से ही घी बनता है॥
पुनः जिज्ञासा !!! कैसे ??
यह तो माँ को भी नही पता !!:)
क्यूंकि उसे तो गौरव है,
आधुनिक माँ होने का, जिसे
उपलब्ध होता रहा है, सदा,
कागज़ की गाय का घी।
और प्लास्टिक की गाय का दूध,
इस बड़े शहर में॥