Wednesday, February 10, 2016

यह समाज आखिर चाहता क्या है ???

रहस्यमय और आपत्तिजन्य प्रेम जो समाज के सरोकारों से परे हो, मर्यादाओं में न बंधने जैसा हो, और जिसे करने में डर सताए फिर भी करने का मन हो, जिसमे एक-दूजे के लिए मर मिटने का जूनून हो और हर एक समय मदमस्त नैनों में डूबे रहने की आकंठ वृत्ति हो, श्रेष्ठ है। सामान्यतया इसके बुदबुदाने की उम्र किशोरवय के शरद के बाद आने वाला यौवन का वसंत होता है। और यहीं से व्यक्ति एक आदर्श नागरिक या आदर्श प्रेमी होने की राह चुनता है, कोई एक ही हो पाता है उत्कृष्ट प्रेमी और अधिकांशतः आदर्श नागरिक ज़्यादा बनते हैं, आदर्श प्रेमी बनने के रस्ते बड़ी अड़चने और हज़ार जोड़ी जूतों का दुःस्वप्न सदा सताता रहता है इसलिए लोग मध्य मार्गी हो कर, कुछ सूखे गुलाब किताबों में लिए कलटी काट लेते हैं।
दूसरा और आदर्श अवसर शादी के रूप में आता है जब वही आदर्श समाज उस दबे हुए रोमांच को पुनः वैधानिक तरीके से पुनर्स्थापित करने का प्रयास करता है और इसी प्रयास से हमारे समाज का संरचनात्मक ढांचा बहुतायत खड़ा हुआ है और ऐसा नहीं है कि इस तरह से सृजित प्रेम में ऊपर लिखे प्रेम आनंद का अवसर कम हो किन्तु आदमी ढूंढता वह है जो हो नहीं सका। किन्तु अभिन्न सत्य है की सामाजिक रीति से हुए विवाहो में इस उत्कृष्ट प्रेम के अनगिनत अवसर आते हैं जो चेतना में प्रेम के उसी अनचाहे डर और उससे परे एक दूसरे पर मर मिटने की चाहत लिए फलसफे से बने होते हैं।
8th Feb मेरी और श्वेता की शादी की पांचवी वर्षगांठ, और हम उपरोक्त प्रेम के अवसर तलाशते हुए अब भी पाये जा सकते हैं, छुपा के जमा किये पैसो से उसने कलाई पर बाँधने के लिए वक़्त का तोहफा दिया है, एक डर तो यह की फिजूल खर्ची पर १० मिनट का भाषण, पैसे छुपाने की आदत पर नैतिकता का पाठ और उस से कहीं ऊपर प्रेम की नूतन अभिव्यक्ति। और चूँकि दो छोटे बच्चे अब हमारे जीवन के प्रसून हैं साथ ही दोनों ही आदर्श समाज की भूमिका निभाने में बेहद माहिर। प्रेम के अवसरों को तलाशना, ताड़ना और किंचित पा भी जाना हो जाता है किन्तु तभी दरवाजे पर घंटी बज जाती है, मन कचोट जाता है अब यह समाज आखिर चाहता क्या है ???